मध्य प्रदेश सरकार को राज्य परिवहन प्राधिकरण (STA) के पुनर्गठन मामले में बड़ा कानूनी झटका लगा है। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने राज्य सरकार द्वारा जारी पुनर्गठन अधिसूचना के अमल पर फिलहाल रोक लगा दी है। अदालत ने मामले को गंभीर मानते हुए संबंधित अधिकारियों से जवाब भी मांगा है।
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने स्वयं स्वीकार किया कि पुनर्गठन प्रक्रिया में कुछ कानूनी कमियां रह गई थीं। इन्हें दूर करने के लिए सरकार ने अदालत से अतिरिक्त समय की मांग की है।
हाईकोर्ट पहुंचा मामला
यह मामला हरिशंकर सिंह पटेल और अन्य याचिकाकर्ताओं द्वारा दायर याचिका के माध्यम से हाईकोर्ट के समक्ष पहुंचा। याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत में तर्क दिया गया कि राज्य परिवहन प्राधिकरण के पुनर्गठन में मोटर वाहन अधिनियम के कुछ प्रावधानों का पालन नहीं किया गया है।
याचिका में यह भी कहा गया कि नई संरचना में कुछ ऐसे पदाधिकारियों को शामिल किया गया है जिनकी अन्य प्रशासनिक जिम्मेदारियों के कारण हितों के टकराव की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
सुनवाई के दौरान राज्य शासन की ओर से अदालत को बताया गया कि अधिसूचना जारी करने की प्रक्रिया में कुछ कानूनी त्रुटियां रह गई हैं। इन कमियों को दूर करने के लिए सरकार ने तीन महीने का समय देने का अनुरोध किया।
सरकार की इस स्वीकारोक्ति को ध्यान में रखते हुए अदालत ने फिलहाल अधिसूचना के क्रियान्वयन पर अंतरिम रोक लगाने का फैसला सुनाया।
वरिष्ठ अधिकारी से मांगा जवाब
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने वरिष्ठ आईएएस अधिकारी मनीष सिंह से भी जवाब तलब किया है। अदालत यह जानना चाहती है कि पुनर्गठन प्रक्रिया में अपनाई गई प्रशासनिक और कानूनी प्रक्रियाएं किस आधार पर तय की गई थीं।
मामले से जुड़े पक्षों और परिवहन कारोबारियों का कहना है कि पुनर्गठन के पीछे राज्य परिवहन प्राधिकरण की कुछ प्रशासनिक गतिविधियों को ग्वालियर से भोपाल स्थानांतरित करने की संभावना भी हो सकती है।
हालांकि सरकार की ओर से इस संबंध में कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है, लेकिन परिवहन क्षेत्र से जुड़े लोगों के बीच इस मुद्दे को लेकर चर्चा जारी है।
परिवहन क्षेत्र के लिए अहम संस्था
राज्य परिवहन प्राधिकरण प्रदेश में बस परमिट जारी करने, रूट निर्धारण, परिवहन नीतियों के क्रियान्वयन और अन्य महत्वपूर्ण प्रशासनिक निर्णयों में प्रमुख भूमिका निभाता है।
ऐसे में इस संस्था की संरचना और कार्यप्रणाली में किसी भी बदलाव का सीधा असर परिवहन व्यवसाय, बस ऑपरेटरों और यात्रियों पर पड़ सकता है।
अगली सुनवाई पर टिकी निगाहें
हाईकोर्ट द्वारा अंतरिम रोक लगाए जाने के बाद फिलहाल पुनर्गठन की प्रक्रिया ठहर गई है। अब सभी पक्षों की नजर अदालत की अगली सुनवाई पर है, जहां सरकार को अपनी स्थिति स्पष्ट करनी होगी और कानूनी कमियों को लेकर जवाब प्रस्तुत करना होगा।




















