जिस मध्य प्रदेश ने सरदार सरोवर परियोजना के लिए अपनी ज़मीन दी, अपने जंगल दिए, अपने गाँव डुबोए और लाखों लोगों का विस्थापन सहा, उसी प्रदेश के अधिकारों की रक्षा करने के बजाय भाजपा सरकार ने घुटने टेक दिए।
प्रदेश सरकार ने पहले गुजरात से ₹7,669 करोड़ के मुआवज़े की मांग की थी, लेकिन अब समझौते के नाम पर उल्टा ₹550 करोड़ गुजरात को देने पर सहमति जता दी।
माँ नर्मदा का उद्गम मध्य प्रदेश में है, नदी का अधिकांश प्रवाह भी यहीं है, फिर भी प्रदेश के किसान सिंचाई के लिए तरस रहे हैं, गाँवों में पेयजल का संकट है और नहरों का विस्तार अधूरा है। ऐसे में प्रदेश के हितों की रक्षा करना सरकार की जिम्मेदारी थी, लेकिन मोहन सरकार ने मध्य प्रदेश का पक्ष मजबूती से रखने के बजाय समझौते का रास्ता चुन लिया।
मध्य प्रदेश की जनता जानना चाहती है— आख़िर प्रदेश के अधिकारों से समझौता क्यों किया गया?
प्रदेश के हितों की कीमत पर यह फैसला किसके दबाव में लिया गया?
मध्य प्रदेश का स्वाभिमान सर्वोपरि है। प्रदेश के अधिकारों और जनता के हितों से किसी भी प्रकार का समझौता स्वीकार नहीं किया जाएगा।
-जयवर्धन सिंह,कांग्रेस विधायक

















