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Tuesday, July 7, 2026
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MP High Court: गर्भपात के लिए पति की सहमति जरूरी नहीं, महिला को है निर्णय लेने का अधिकार- इंदौर हाई कोर्ट

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MP High Court News: इंदौर हाई कोर्ट ने कहा कि कानूनी समय-सीमा के भीतर गर्भ जारी रखना या समाप्त करना महिला का अधिकार है। अदालत ने स्पष्ट किया कि गर्भपात के लिए पति की सहमति आवश्यक नहीं है।

इंदौर। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने महिलाओं के प्रजनन अधिकारों को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि कानून में तय समय-सीमा के भीतर गर्भ जारी रखना है या उसका समापन कराना है, इसका निर्णय पूरी तरह महिला का होगा। अदालत ने स्पष्ट किया कि गर्भपात के लिए पति की सहमति कानूनी रूप से आवश्यक नहीं है। इसी के साथ कोर्ट ने 13 सप्ताह की गर्भवती विवाहित महिला को मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) अधिनियम के तहत गर्भसमापन की अनुमति दे दी।

यह आदेश 29 जून 2026 को पारित किया गया। मामला इंदौर संभाग के एक विवाहित दंपती से जुड़ा है, जिनका विवाह करीब दो वर्ष पहले हुआ था। याचिका के अनुसार, शादी के बाद दोनों के बीच लगातार मतभेद बढ़ते गए और बाद में वे अलग रहने लगे। इसी दौरान महिला गर्भवती हुई। रिश्तों में आई खटास और भविष्य की परिस्थितियों को देखते हुए महिला ने गर्भ जारी नहीं रखने का फैसला किया और हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

महिला ने अपनी याचिका में कहा कि वैवाहिक संबंध टूटने की स्थिति में बच्चे का जन्म उसके लिए मानसिक, सामाजिक और भावनात्मक रूप से कठिन होगा। इसी आधार पर उसने अधिवक्ता जी.पी. सिंह के माध्यम से अदालत से गर्भसमापन की अनुमति देने का अनुरोध किया।

सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने महिला के पति को नोटिस जारी किया था। अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार, नोटिस की विधिवत तामील भी हुई, लेकिन इसके बावजूद पति किसी भी सुनवाई में उपस्थित नहीं हुआ। वहीं, राज्य सरकार की ओर से भी याचिका का कोई विरोध दर्ज नहीं कराया गया।

अपने फैसले में खंडपीठ ने X v. Principal Secretary, Health and Family Welfare Department का उल्लेख करते हुए कहा कि संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत प्रत्येक महिला को अपने शरीर और प्रजनन संबंधी निर्णय स्वयं लेने का अधिकार प्राप्त है। यह उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता, गरिमा और मौलिक अधिकार का अभिन्न हिस्सा है।

अदालत ने कहा कि अवांछित गर्भावस्था का सबसे अधिक शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक प्रभाव महिला पर पड़ता है। ऐसे में गर्भावस्था जारी रखनी है या नहीं, इसका अंतिम निर्णय महिला का ही होना चाहिए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी भी महिला को उसकी इच्छा के विरुद्ध मातृत्व स्वीकार करने या गर्भ जारी रखने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।

खंडपीठ ने यह भी माना कि याचिकाकर्ता की गर्भावस्था 13 सप्ताह और एक दिन की थी, जो Medical Termination of Pregnancy Act, 1971 के तहत निर्धारित कानूनी सीमा के भीतर आती है। इसलिए अधिकृत चिकित्सकों द्वारा निर्धारित प्रक्रिया और चिकित्सकीय मानकों का पालन करते हुए गर्भसमापन की अनुमति दी जा सकती है। इसी आधार पर अदालत ने महिला की याचिका स्वीकार करते हुए गर्भपात की अनुमति प्रदान कर दी।

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