डॉ. बालाराम परमार ‘हँसमुख। इतिहास केवल तिथियों का लेखा-जोखा नहीं होता। इतिहास तात्कालिक समाज के सामूहिक मन की दशा, दिशा और दशान्तर का दस्तावेज है। जब कोई युग अपनी पराजय की स्मृतियों से निकलकर आत्मविश्वास की ओर लौटता है, तो इतिहासकार उसे ‘जागरण’ कहते हैं।
यूरोप में पुनर्जागरण की शुरुआत 14वीं शताब्दी से हुई और यह 17वीं शताब्दी तक चला। जिसने यूरोप को अंधकार से निकाल कर कला, साहित्य, विज्ञान और स्वतंत्र सोच को बढ़ावा दिया। आजाद भारत के संदर्भ में यदि 2014 के बाद के दशक को देखें तो एक शब्द उभरता है और वह है हिंदू जागरण और इस जागरण के सूत्रधार के रूप में नरेंद्र मोदी का प्रधानमंत्रीत्व काल दर्ज होगा।
1947 से 2014 तक का कालखंड हिंदू समाज के लिए मनोवैज्ञानिक रूप से ‘अधीनता के बाद का आघात’ जैसा था। राजनीतिक स्वतंत्रता मिली, पर तात्कालीन सरकारों के तथाकथित छद्म धर्मनिरपेक्ष राज्य के प्रोपोगंडा की वजह से सांस्कृतिक मन स्वतंत्र नहीं हो पाया। राम जन्मभूमि, काशी-विश्वनाथ, मथुरा, सोमनाथ जैसे हिन्दू प्रतीक या तो विवाद में थे या उपेक्षित थे। शिक्षा, पाठ्यक्रम, लोक नीति में ‘धर्मनिरपेक्षता’ के नाम पर हिंदू अस्मिता को अपराध-बोध से जोड़ा गया।
मनोविज्ञान की भाषा में इसे सीखी हुई लाचारी कहते हैं। जिसमें कोई व्यक्ति बार-बार असफलता या तनावपूर्ण परिस्थितियों का सामना करने के बाद यह मान लेता है कि वह अपनी स्थिति को कभी नहीं सुधार सकता। इस तरह की मनोग्रंथी के परिणामस्वरूप, जब परिस्थिति बदलने के अवसर भी मिलते हैं, तब भी वह प्रयास करना छोड़ देता है। बहुजन हिन्दू समाज आजादी के दिन से लगातार यह सुनता रहा कि उसकी आस्था, उसके प्रतीक, उसके इतिहास विवादास्पद हैं। तब कुछ दशक बाद 80 करोड़ हिन्दुओं ने प्रतिक्रिया देना बंद कर दिया था।

2014 में जब नरेंद्र मोदी पहली बार प्रधानमंत्री बने, तब बहुसंख्यक समाज के लिए वह केवल सत्ता परिवर्तन नहीं था। वह एक सामूहिक विश्वास था कि छद्म धर्मनिरपेक्षता की बखिया उधेड़ने का होगा। क्योंकि हिन्दू समाज को लगा कि युवावस्था से एक ऐसा नेता जो सार्वजनिक मंच से ‘भारत माता की जय’, ‘वंदे मातरम्’, ‘जय श्रीराम’ को गर्व से बोलता आया, वह हिंदू समाज को वैधता का भाव देगा।
मोदी का प्रधानमंत्रीत्व काल संस्थागत निर्णयों के साथ, व्यक्तिगत सांकेतिक नेतृत्व से भी पहचाना जाएगा। जैसे कि राम मंदिर निर्माण और आस्था की पुनर्स्थापना। 5 अगस्त 2020 को अयोध्या में राम मंदिर का भूमिपूजन और 22 जनवरी 2024 को प्राण प्रतिष्ठा। मोदी के प्रधानमंत्रीत्व की सबसे अप्रत्याशित और अप्रतिम सांस्कृतिक घटना है। यह केवल ईंट-पत्थर का निर्माण नहीं था। 500 वर्षों के संघर्ष, न्यायिक प्रक्रिया, और सामाजिक गतिरोध के बाद एक समाज को यह संदेश मिला कि उसकी आस्था सरयु तट पर पुनः अजर अमर हो गई।
जिस घाव को पीढ़ियाँ 500 वर्ष से ढो रही थीं, उसे एक राष्ट्रीय धार्मिक समारोह के माध्यम से सहला कर दुखद अनुभव का पटाक्षेप होते देख मन को शांति अनुभूति हुई। नरेंद्र मोदी स्वयं श्रमिकों के पैर धोते हैं, स्वयं यजमान बनते हैं। यह राजा-प्रजा का नहीं, प्रधान सेवक-भक्त का संबंध था। इस आंखों देखी एक घटना ने करोड़ों हिंदुओं में ‘जनता का जनता के लिए, जनता द्वारा’ स्वशासन का भाव जगा दिया। संविधान प्रदत्त मतदान की कीमत की पहचान करवा दी।
वेदों और पुराणों में काशी को ‘अविमुक्त क्षेत्र’ कहा गया है। मुगल काल से जीर्ण-शीर्ण गलियों में दबा विश्वनाथ मंदिर 2021 में कॉरिडोर के रूप में पुनः दिव्य और भव्य रूप में प्रकट हुआ। उज्जैन में महाकाल लोक, केदारनाथ धाम का पुनर्निर्माण, सोमनाथ का जीर्णोद्धार, बद्रीनाथ मास्टर प्लान, ये सब ‘लोक निर्माण’ के साथ ‘लोक चेतना निर्माण’ भी हैं, जो 100 करोड़ सनातनी लोगों का सिर गर्व से ऊंचा करता है।

सनातनी समाज जब अपने तीर्थों को टूटा-फूटा देखता था, तो अवचेतन में यह मान लेता था कि उसका देवता भी पराजित है। जब वही तीर्थ स्वर्ण-कलश से जगमगाते हैं, हेलिकॉप्टर से पुष्प वर्षा होते देखता है तो अवचेतन में ‘देवता विजयी है, अतः मैं भी विजयी हो सकता हूँ’। यह बिंब बना है। यही हिंदुत्व का शंखनाद है। यही हिन्दू जागरण काल है।
सरदार पटेल की प्रतिमा, 182 मीटर ऊँची केवल लौह पुरुष का सम्मान नहीं है। वह एक संदेश है कि हिंदू समाज के नायक अब उपेक्षित नहीं रहेंगे। चंद्रयान-3 की सफलता पर ‘शिव शक्ति पॉइंट’ नामकरण, तिरंगा यात्रा, हर घर तिरंगा अभियान, ये सब नवजागरण काल की प्रतीकात्मक राजनीति है।
प्रत्येक समाज अपनी पहचान प्रतीकों से बनाता है। जब प्रतीक सशक्त होते हैं, तो व्यक्ति का आत्म-सम्मान बढ़ता है। 2014 के बाद हिंदू समाज ने स्वयं को छद्म धर्मनिरपेक्षता की मनोवृत्ति से निकालकर हिन्दू राष्ट्र की चेतना में स्थापित किया। मुग़ल और अंग्रेजी शासनकाल और आजादी के बाद मंदिर, मठ, पर्व केवल निजी आस्था माने जाते थे। 2014 के बाद दीपावली पर विदेशी राष्ट्राध्यक्षों द्वारा दीप जलाना, अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस, प्रयागराज सिंहस्थ को अंतर्राष्ट्रीय पहचान। इन हिन्दू समाज की आस्थाओं को सार्वजनिक गौरव में बदलने का काम एनडीए नीत नरेंद्र मोदी सरकार ने किया है।
सरकारी तौर पर हिंदू समाज को 70 वर्षों तक बताया गया कि उसकी आस्था निजी कोठरी में रहे। मोदी सरकार के काल ने उसे श्रीनगर के लाल चौक पर तिरंगा लहरा कर सार्वजनिक कर दिया कि अब राष्ट्रीय हिंदुओं का भी पर्व हैं।
मोदी के प्रधानमंत्रीत्व काल में सबका साथ, सबका विकास के साथ ‘सबका विश्वास’ जोड़ कर 140 करोड़ देशवासियों का आत्म-सम्मान लोटाया। जब प्रधानमंत्री स्वयं जनेऊ पहनकर, तिलक लगाकर पूजा करते हैं, तो हिन्दू समाज को लगता है कि उसकी पहचान में गर्व है।

‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’, नॉर्थ-ईस्ट को मुख्यधारा में लाना, जनजातीय गौरव दिवस, बिरसा मुंडा को राष्ट्रीय नायक बनाना। हबीबगंज रेलवे स्टेशन का नाम बदलकर को रानी कमलापति, होशंगाबाद जिले का नाम बदलकर नर्मदापुरम करना और हिंदुत्व को ब्राह्मणवाद के दायरे से निकालकर लोक हिंदुत्व बनाने का काम नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्रीत्व काल में हुआ है।
अनेकों अवसर निषादराज का स्मरण, संत रविदास, संत कबीर, संत तुकाराम आदि का राष्ट्रीय त्यौहार पर स्मरण। प्रशासनिक और शासकीय कार्यों में सनातनी रीति-रिवाज से पूजा अर्चना कर शुभारंभ। ये सब हाशिए पर धकेल दी गई भारतीय सनातनी परंपरा को पुनः स्थापित करने का श्रेय मोदी सरकार को जाता है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में भारतीय ज्ञान परंपरा, इतिहास के पुनर्लेखन का प्रयास, 1857 के शहीदों का स्मरण, नेताजी की प्रतिमा का इंडिया गेट पर लगना। ऐसे कारनामे हैं, जिनके उदित होने पर भारतीय समाज ने अपना अतीत देखा, परखा और जाना है। अब यही भारतवर्ष का भविष्य है।
2014 के बाद आंतरिक स्तर पर हिंदू को हिंदू होना सिखाना। राष्ट्रीय स्तर भारत को सभ्य राष्ट्र के रूप में प्रचारित करना और वैश्विक स्तर पर वसुधैव कुटुम्बकम् को विदेश नीति का आधार बनाना। इन सब कार्यों का लेखा-जोखा इतिहासकार आजादी के 100 साल के अवसर पर जब 1947-2047 का शताब्दी खंड दो भागों में बाँटेंगे। स्वतंत्र परन्तु सांस्कृतिक रूप से भ्रमित भारत 1947-2014 और सांस्कृतिक रूप से स्वस्थ भारत 2014-2047।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उपहास सहे, आलोचना सही, पर टूटा नहीं। वह अक्षय पात्र बन रहा है। इसीलिए कहा जा सकता है नरेंद्र मोदी का प्रधानमंत्रीत्व काल इतिहास में हिंदू जागरण काल के रूप में दर्ज किया जाएगा। लेकिन, समर शेष है।नरेंद्र मोदी का प्रधानमंत्रीत्व काल 2014 में आरंभ हुआ। पहला दशक बीत चुका है। राम मंदिर बना, काशी सँवरी, भारत चंद्रमा पर पहुँचा, पर हिंदू जागरण का यज्ञ अभी पूर्णाहुति पर नहीं पहुँचा।
2029 तक का समय इस यज्ञ की दूसरी आहुति है। अभी मथुरा-काशी के न्यायिक प्रश्न शेष हैं। अभी शिक्षा में भारतीय ज्ञान परंपरा का पूर्ण समावेश शेष है। अभी जनजातीय, दलित, पिछड़े समाज को हिंदू मुख्यधारा में समरसता के साथ प्रतिष्ठित करना शेष है। अभी ‘विकसित भारत 2047’ का संकल्प शेष है। समर शेष है।

















