MP Rajya Sabha Election: मध्य प्रदेश में राज्यसभा चुनाव का सियासी तापमान लगातार बढ़ता जा रहा है। भारतीय जनता पार्टी ने तीसरी सीट के लिए मछुआ कल्याण बोर्ड के अध्यक्ष महेश केवट को उम्मीदवार बनाकर मुकाबले को नया मोड़ दे दिया है। भाजपा के इस कदम के बाद कांग्रेस की उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन के सामने नई चुनौती खड़ी होती दिखाई दे रही है।
इससे पहले भाजपा की ओर से तरुण चुघ और रजनीश अग्रवाल ने राज्यसभा चुनाव के लिए नामांकन दाखिल किया था। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि मौजूदा विधानसभा गणित के आधार पर इन दोनों नेताओं की जीत लगभग तय मानी जा रही है। ऐसे में अब सभी की नजर तीसरी सीट पर टिक गई है, जहां मुकाबला रोचक होता जा रहा है।
कांग्रेस ने पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह का कार्यकाल पूरा होने के बाद मीनाक्षी नटराजन को उम्मीदवार बनाया है। उन्होंने भी सोमवार को अपना नामांकन दाखिल कर दिया।
क्या कहता है विधानसभा का गणित?
मध्य प्रदेश विधानसभा में कुल 230 सदस्य हैं, लेकिन प्रभावी मतों की संख्या 228 है। वर्तमान में भाजपा के पास 164 विधायक हैं, जबकि कांग्रेस के खाते में 64 विधायक हैं।
हालांकि कुछ परिस्थितियों के कारण कांग्रेस का आंकड़ा 62 तक माना जा रहा है। इनमें बीना विधायक निर्मला सप्रे के मतदान को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं होना और विजयपुर विधायक मुकेश मल्होत्रा के मतदान पर रोक प्रमुख कारण बताए जा रहे हैं।
राज्यसभा की तीनों सीटों पर जीत के लिए प्रत्येक उम्मीदवार को 58 वोटों की आवश्यकता होगी। इस गणित के अनुसार कांग्रेस के पास अपनी सीट सुरक्षित करने के लिए पर्याप्त संख्या है, लेकिन भाजपा के तीसरे उम्मीदवार के मैदान में उतरने से समीकरण बदल गए हैं।
भाजपा को कहां से चाहिए अतिरिक्त वोट?
भाजपा को दो उम्मीदवारों की जीत सुनिश्चित करने के लिए 116 वोटों की जरूरत है। 164 विधायकों में से 116 वोट देने के बाद उसके पास 48 वोट बचते हैं।
तीसरे उम्मीदवार को जीताने के लिए भाजपा को कुल 58 वोट चाहिए होंगे। यानी पार्टी को अतिरिक्त 10 वोटों की आवश्यकता पड़ेगी। यही वजह है कि अब क्रॉस वोटिंग और राजनीतिक रणनीति को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं।
क्या है भाजपा की रणनीति?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा का यह कदम केवल तीसरी सीट जीतने तक सीमित नहीं हो सकता। हाल के वर्षों में कई राज्यों के राज्यसभा चुनावों में क्रॉस वोटिंग और अप्रत्याशित परिणाम देखने को मिले हैं।
विशेष रूप से हिमाचल प्रदेश में 2024 के राज्यसभा चुनाव का उदाहरण अक्सर दिया जा रहा है, जहां राजनीतिक समीकरण अंतिम समय में बदल गए थे।
सूत्रों के अनुसार भाजपा कांग्रेस के भीतर मौजूद मतभेदों को भी राजनीतिक रूप से भुनाने की कोशिश कर सकती है। मीनाक्षी नटराजन के नाम को लेकर पार्टी के भीतर पूरी तरह सहमति नहीं होने की चर्चाएं भी सामने आती रही हैं।
ऐसे में यदि मतदान के दौरान कुछ विधायक अलग रुख अपनाते हैं तो मुकाबला दिलचस्प हो सकता है। हालांकि कांग्रेस नेतृत्व लगातार अपने विधायकों को एकजुट बनाए रखने का दावा कर रहा है। अब 18 जून को होने वाले मतदान और उसके नतीजों पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।

















