पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर (PoJK) में राजनीतिक असंतोष लगातार गहराता जा रहा है। चुनावी व्यवस्था में बदलाव और क्षेत्रीय विधानसभा की कुछ सीटों को समाप्त करने की मांग को लेकर चल रहा आंदोलन अब हिंसक रूप ले चुका है। हाल के दिनों में प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच कई स्थानों पर गंभीर झड़पें हुई हैं, जिनके बाद पूरे इलाके में तनाव बढ़ गया है।
स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार, आंदोलन का नेतृत्व कर रही जॉइंट आर्मी एक्शन कमेटी (JAAC) और पुलिस के बीच हुए टकराव में अब तक कम से कम सात लोगों की मौत हुई है। मृतकों में तीन नागरिक और चार पुलिसकर्मी शामिल बताए जा रहे हैं। इसके अलावा 63 से अधिक लोगों के घायल होने की जानकारी सामने आई है।
JAAC पर कार्रवाई के बाद और बढ़ा तनाव
प्रदर्शन तेज होने के बाद क्षेत्रीय प्रशासन ने जॉइंट आर्मी एक्शन कमेटी (JAAC) को आतंकवाद-रोधी कानूनों के तहत प्रतिबंधित संगठन घोषित कर दिया है। हालांकि इस फैसले के बावजूद संगठन ने अपना आंदोलन जारी रखने का ऐलान किया है।
प्रतिबंध लगाए जाने के बाद JAAC समर्थकों में नाराजगी और बढ़ गई। संगठन ने 9 जून को पूरे इलाके में हड़ताल और बंद का आह्वान किया है। इससे आने वाले दिनों में हालात और अधिक संवेदनशील होने की आशंका जताई जा रही है।
पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हिंसक टकराव
रावलकोट के कमिश्नर सरदार वहीद के अनुसार, झड़पों में तीन आम नागरिकों की मौत हुई जबकि कई लोग घायल हुए हैं। वहीं सुरक्षा बलों को भी भारी नुकसान उठाना पड़ा है।
रिपोर्टों के मुताबिक चार पुलिसकर्मियों की जान गई है और 23 अन्य जवान घायल हुए हैं। पाकिस्तानी प्रशासन का दावा है कि कुछ पुलिसकर्मियों पर शॉटगन से हमला किया गया। इसी आधार पर प्रशासन इस घटना को गंभीर सुरक्षा चुनौती के रूप में देख रहा है।
70 से अधिक लोगों की गिरफ्तारी
बढ़ते विरोध प्रदर्शनों को देखते हुए प्रशासन ने कार्रवाई तेज कर दी है। अधिकारियों के अनुसार सप्ताहांत के दौरान JAAC से जुड़े 70 से अधिक लोगों को हिरासत में लिया गया है।
यह आंदोलन केवल हालिया घटनाओं तक सीमित नहीं है। पिछले वर्ष सितंबर और अक्टूबर में भी इसी मुद्दे को लेकर बड़े पैमाने पर प्रदर्शन और हिंसा हुई थी, जिसमें 200 से अधिक लोग प्रभावित हुए थे।
क्या है आंदोलन की मुख्य मांग?
JAAC की प्रमुख मांग क्षेत्रीय विधानसभा में आरक्षित 12 सीटों को समाप्त करने की है। ये सीटें उन शरणार्थियों के लिए आरक्षित हैं जो 1947 के बाद मुख्य पाकिस्तान में बस गए थे।
आंदोलनकारी समूहों का आरोप है कि इन सीटों का इस्तेमाल मुख्यधारा की पाकिस्तानी राजनीतिक पार्टियां क्षेत्रीय राजनीति और सरकार गठन को प्रभावित करने के लिए करती हैं। उनका कहना है कि इन सीटों को समाप्त करने से क्षेत्र को अधिक स्वायत्तता मिल सकती है और स्थानीय लोगों की राजनीतिक भागीदारी मजबूत होगी।
















