संतोष कुमार। भारत ईरान में स्थित रणनीतिक रूप से अहम चाबहार बंदरगाह परियोजना में अपनी भूमिका को धीरे-धीरे खत्म करने पर फिर से विचार कर रहा है। इसकी सबसे बड़ी वजह अमेरिका के प्रतिबंधों को लेकर बढ़ती अनिश्चितता मानी जा रही है, जिसने इस दीर्घकालिक परियोजना के भविष्य पर सवाल खड़े कर दिए हैं। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने शुक्रवार को कहा कि भारत इस पूरे मसले पर अमेरिका के साथ लगातार बातचीत कर रहा है।
ईरान के साथ व्यापारिक संबंध रखने वाले देशों पर अमेरिका द्वारा लगाए गए नए टैरिफ और प्रतिबंधों के मद्देनजर भारत सरकार के इस समझौते से हटने की अटकलें तेज हो गई हैं। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए विदेश मंत्रालय ने बताया कि 28 अक्टूबर को अमेरिकी वित्त विभाग ने एक पत्र जारी कर 26 अप्रैल, 2026 तक वैध सशर्त प्रतिबंध छूट से जुड़े दिशा-निर्देश दिए थे। भारत इस व्यवस्था को अंतिम रूप देने के लिए अमेरिकी पक्ष के साथ विचार-विमर्श कर रहा है।
भारत की पकड़ होगी कमजोर
चाबहार परियोजना पर अमेरिकी ट्रेजरी विभाग की प्रमुख प्रतिबंध प्रवर्तन इकाई विदेशी संपत्ति नियंत्रण कार्यालय (OFAC) की करीबी नजर बनी हुई है। माना जा रहा है कि चाबहार को लेकर OFAC की निगरानी अमेरिका की व्यापक रणनीति का हिस्सा है, जिसके तहत ईरान पर आर्थिक और कूटनीतिक दबाव बढ़ाया जा रहा है। अमेरिका पहले भी ईरान से जुड़ी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को निशाना बनाता रहा है और चाबहार बंदरगाह भी इसी दायरे में आता है।
ईरान के दक्षिण-पूर्वी तट पर, ओमान की खाड़ी के किनारे स्थित चाबहार बंदरगाह भारत के लिए रणनीतिक रूप से बेहद अहम रहा है। नई दिल्ली इसे अपनी क्षेत्रीय कनेक्टिविटी रणनीति का प्रमुख स्तंभ मानती रही है, क्योंकि यह भारत को अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक एक वैकल्पिक व्यापार मार्ग देता है। इस रास्ते से पाकिस्तान को बाईपास किया जा सकता है और पारंपरिक मार्गों पर निर्भरता कम होती है। भारत ने इस परियोजना में टर्मिनलों के विकास और संचालन सहित कई क्षेत्रों में निवेश किया है, लेकिन अमेरिकी प्रतिबंध लंबे समय से इसकी प्रगति में सबसे बड़ी बाधा बने हुए हैं।
मामले से जुड़े जानकार सूत्रों के अनुसार, भारत चाबहार बंदरगाह परियोजना में अपनी प्रत्यक्ष हिस्सेदारी समाप्त करने के उद्देश्य से लगभग 12 करोड़ अमेरिकी डॉलर हस्तांतरित करने की प्रक्रिया में है। इसके साथ ही परियोजना के विकास को आगे बढ़ाने के लिए एक नई संस्था के गठन पर भी विचार किया जा रहा है। इस मॉडल के तहत भारतीय सरकार की सीधी हिस्सेदारी समाप्त हो सकती है, लेकिन एक सीमित और अप्रत्यक्ष समर्थन बना रह सकता है।
भारत की सोची-समझी राणनीति
सूत्रों का कहना है कि यह कदम भारत की ओर से अचानक पीछे हटने के बजाय एक सोची-समझी रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। इसका मकसद अमेरिका के साथ रणनीतिक रिश्तों में संतुलन बनाए रखना है, जबकि क्षेत्रीय हितों को पूरी तरह नजरअंदाज भी न किया जाए। उल्लेखनीय है कि पिछले साल सितंबर में डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने ईरान के चाबहार बंदरगाह के संबंध में 2018 में दी गई प्रतिबंध छूट को रद्द करने का फैसला सुनाया था, जिससे परियोजना को लेकर अनिश्चितता और बढ़ गई।
जैसे-जैसे अप्रैल 2026 की छूट अवधि नजदीक आ रही है, इस बात पर सभी की नजरें टिकी हैं कि उसके बाद चाबहार को लेकर भारत की रणनीति क्या होगी। क्या भारत कम से कम तकनीकी और परिचालन भूमिका में बना रहेगा या फिर परियोजना से और दूरी बनाएगा। यह आने वाले महीनों में साफ हो जाएगा।

















