इंदौर नगर निगम के बहुचर्चित फर्जी बिल घोटाले में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने कार्रवाई करते हुए मामले के कथित मास्टरमाइंड और पूर्व सहायक इंजीनियर अभय राठौर, मोहम्मद जाकिर और राहुल वडेरा को गिरफ्तार कर लिया है। तीनों आरोपियों को हिरासत में लेने के बाद ईडी ने उन्हें विशेष पीएमएलए अदालत में पेश किया, जहां से अदालत ने तीन दिन की रिमांड मंजूर कर दी। मामले की अगली सुनवाई 5 जून को निर्धारित की गई है।
यह मामला पिछले कुछ वर्षों में नगर निगम स्तर पर सामने आए सबसे बड़े वित्तीय घोटालों में से एक माना जा रहा है। जांच एजेंसियों के अनुसार, आरोपियों ने पुराने और पहले से पूरे हो चुके कार्यों को नया दिखाकर करोड़ों रुपये के फर्जी भुगतान करवाए।
फर्जी दस्तावेजों से निकाले गए करोड़ों रुपये
जांच में सामने आया है कि घोटाले को अंजाम देने के लिए फर्जी वर्क ऑर्डर, नकली मापन पुस्तिकाएं (एमबी), भुगतान प्रस्ताव और अन्य दस्तावेज तैयार किए गए। आरोप है कि अधिकारियों के लॉगिन आईडी, पासवर्ड और सिस्टम एक्सेस का दुरुपयोग कर इन फाइलों को वैध दिखाया गया।
जांच एजेंसियों का कहना है कि तकनीकी स्वीकृति, ऑडिट और भुगतान जैसी पूरी प्रक्रिया कागजों पर पूरी कर दी गई, जबकि कई मामलों में जमीन पर कोई कार्य हुआ ही नहीं था। इसके बाद करोड़ों रुपये विभिन्न ठेकेदारों के खातों में स्थानांतरित कर दिए गए।
ड्रेनेज विभाग से खुला था मामला
घोटाले का खुलासा वर्ष 2024 में नगर निगम के ड्रेनेज विभाग से जुड़ी भुगतान फाइलों की जांच के दौरान हुआ था। प्रारंभिक जांच में लगभग 28 करोड़ रुपये के ऐसे भुगतान सामने आए थे जिनके पीछे वास्तविक कार्य का कोई रिकॉर्ड नहीं मिला।
जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ी, अनियमितताओं का दायरा बढ़ता गया। अब जांच एजेंसियां इसे सौ करोड़ रुपये से अधिक के वित्तीय घोटाले के रूप में देख रही हैं। शुरुआती जांच में 107 करोड़ रुपये के गबन की आशंका जताई गई थी, जबकि अदालत में ईडी ने फिलहाल 92 करोड़ रुपये की अनियमितताओं का उल्लेख किया है।
34 करोड़ रुपये की संपत्तियां पहले ही हो चुकी हैं अटैच
मनी लॉन्ड्रिंग के पहलुओं की जांच कर रही ईडी ने इससे पहले जुलाई 2025 में करीब 34 करोड़ रुपये मूल्य की 43 अचल संपत्तियां अटैच की थीं। इनमें मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में स्थित मकान, कृषि भूमि और अन्य अचल संपत्तियां शामिल हैं।
ईडी का मानना है कि घोटाले से अर्जित धन को विभिन्न संपत्तियों में निवेश किया गया था। एजेंसी अब धन के स्रोत, लेन-देन और लाभार्थियों की विस्तृत जांच कर रही है।
जांच के शुरुआती चरण में कई महत्वपूर्ण फाइलों के गायब होने की जानकारी भी सामने आई थी। बाद में जब उपलब्ध दस्तावेजों की जांच की गई तो कई अधिकारियों के हस्ताक्षर संदिग्ध पाए गए।
सबसे बड़ा सवाल यह बना हुआ है कि अधिकारियों की मूल लॉगिन आईडी और पासवर्ड आरोपियों तक कैसे पहुंचे। जांच एजेंसियां इस पहलू की भी गहराई से पड़ताल कर रही हैं। हालांकि कुछ अधिकारियों को जांच के दौरान क्लीन चिट भी मिल चुकी है।
186 फाइलों की जांच में सामने आई गड़बड़ी
जांच एजेंसियों द्वारा संदिग्ध 186 फाइलों की जाँच की गई, जिनमें 80 प्रतिशत से अधिक मामलों में अनियमितताएं पाई गईं। इनमें ट्रेंचिंग ग्राउंड से संबंधित करोड़ों रुपये के भुगतान वाले प्रकरण भी शामिल बताए जा रहे हैं। फिलहाल ईडी की पूछताछ जारी है और एजेंसी यह पता लगाने का प्रयास कर रही है कि इस कथित घोटाले में और कौन-कौन लोग शामिल थे।


















