कांग्रेस नेता सोनिया गांधी ने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) के नाम में बदलाव को लेकर केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला है। ‘द हिंदू’ अखबार में लिखे एक लेख में उन्होंने इसे देश की “सामूहिक नैतिक विफलता” करार दिया। उनका कहना है कि यह योजना महात्मा गांधी के सर्वोदय के सिद्धांत पर आधारित थी और करोड़ों ग्रामीणों को आजीविका व गरिमा प्रदान करती थी।
राष्ट्रपति ने दी ‘विकसित भारत – जी राम जी’ विधेयक को मंजूरी
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा ‘विकसित भारत – जी राम जी’ विधेयक को दी गई मंजूरी है। इस मंजूरी के साथ ही यह विधेयक अधिनियम बन गया है और भारत के राजपत्र में अधिसूचना जारी कर दी गई है। इसके बाद मनरेगा योजना आधिकारिक तौर पर समाप्त हो गई है और उसकी जगह ‘जी राम जी’ योजना ने ले ली है।
सोनिया गांधी ने लगाए लोकतांत्रिक प्रक्रिया को दरकिनार करने के आरोप
सोनिया गांधी ने अपने लेख में आरोप लगाया कि मोदी सरकार ने इस बदलाव की दिशा में बिना उचित चर्चा, संसदीय प्रक्रिया या केंद्र-राज्य संबंधों का सम्मान किए कदम बढ़ाए हैं। उन्होंने कहा कि महात्मा गांधी का नाम हटाना तो केवल एक प्रतीकात्मक कदम है, असली चिंता योजना की पूरी विकेंद्रित संरचना को नष्ट करने की है। उन्होंने इसे दुनिया की सबसे बड़ी सामाजिक सुरक्षा पहल का अंत बताया।
वित्तीय बोझ और गारंटी के दिनों को लेकर उठाए सवाल
कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष ने दावा किया कि इस बदलाव से राज्यों पर पहले से मौजूद वित्तीय दबाव और बढ़ेगा। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार योजना के मांग-आधारित स्वरूप को खत्म कर रही है। साथ ही, उन्होंने सरकार के उस दावे को भी भ्रामक कहा जिसमें रोजगार गारंटी के दिनों को 100 से बढ़ाकर 125 दिन करने का जिक्र है। सोनिया गांधी का मानना है कि यह बदलाव समाज के सबसे कमजोर वर्गों के हितों के विरुद्ध है।


















