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Wednesday, May 27, 2026
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अब नहीं रुकेगा SIR, सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला SIR प्रक्रिया को दी हरी झंडी

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सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग की SIR प्रक्रिया को वैध ठहराते हुए सभी याचिकाएं खारिज कर दी हैं। इस फैसले से मतदाता सूची संशोधन का रासा साफ हो गया है और आयोग को संवैधानिक मान्यता मिली है।

सर्वोच्च न्यायालय ने आज 27 मई को मतदाता सूची संशोधन से जुड़े मामले में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने भारत निर्वाचन आयोग द्वारा लागू की गई स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR प्रक्रिया को कानूनी रूप से वैध ठहराया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने इस प्रक्रिया के खिलाफ दायर सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया है। इस फैसले के साथ ही चुनाव आयोग के अधिकारों को पूरी तरह से बरकरार रखा गया है।

इस विवाद की शुरुआत पिछले साल जून 2025 में हुई थी जब चुनाव आयोग ने बिहार में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया शुरू की थी। बाद में इसे पश्चिम बंगाल और अन्य कई राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों में भी लागू किया गया। इस नियम के तहत उन मतदाताओं से दस्तावेज मांगे गए जिनके नाम 2002 या 2003 की सूची में नहीं थे। उन्हें यह साबित करना था कि उनके पूर्वजों का नाम पुरानी मतदाता सूची में दर्ज था ताकि उनकी नागरिकता और मतदान अधिकार की पुष्टि हो सके।

कई संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट का किया था रूख

एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स और पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज सहित कई संगठनों ने इसके खिलाफ कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। योगेंद्र यादव जैसे राजनीतिक नेताओं ने भी इसका विरोध किया था। याचिकाकर्ताओं का मुख्य तर्क था कि संविधान के अनुच्छेद 326 और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत चुनाव आयोग के पास इतने व्यापक स्तर पर जांच करने का अधिकार नहीं है। उन्होंने इसे नागरिकता रजिस्टर यानी NRC जैसी प्रक्रिया बताते हुए आपत्ति जताई थी।

याचिकाकर्ताओं ने यह चिंता भी व्यक्त की कि इस प्रक्रिया से गरीब और वंचित लोग सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे। कई असली मतदाता ऐसे हैं जो दशकों पुराने दस्तावेज नहीं जुटा पाते। ऐसे में उनका वोट देने का अधिकार छिन सकता है। बिहार में लाखों नाम हटाए जाने की आशंका जताई गई थी। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि नागरिकता तय करना केंद्र सरकार का काम है और चुनाव आयोग इस दायरे से बाहर जा रहा है।

चुनाव आयोग ने अपनी स्थिति का किया बचाव

चुनाव आयोग ने अपनी स्थिति का मजबूती से बचाव किया। आयोग ने कहा कि मतदाता सूची को स्वच्छ और पारदर्शी रखना उसका संवैधानिक कर्तव्य है। मृत लोगों के नाम हटाना और दोहरे नामों को निकालना जरूरी है। अनुच्छेद 324 और 326 के तहत आयोग को यह अधिकार प्राप्त है कि वह सुनिश्चित करे कि कोई विदेशी नागरिक भारतीय चुनाव में वोट न डाल सके। आयोग ने स्पष्ट किया कि यह कोई कठोर नागरिकता परीक्षण नहीं बल्कि एक प्रशासनिक सत्यापन है।

29 जनवरी 2026 को सीजेआई सूर्य कांत की अगुवाई वाली पीठ ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने लोगों को राहत देते हुए कुछ अंतरिम आदेश भी दिए थे। कोर्ट ने कहा था कि आधार कार्ड जैसे अतिरिक्त दस्तावेजों को भी सत्यापन के लिए मान्य किया जाए ताकि आम जनता को असुविधा न हो। इससे प्रक्रिया को थोड़ा लचीला बनाया गया था।

आज सुनाए गए अंतिम फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि SIR प्रक्रिया असंवैधानिक नहीं है। कोर्ट ने माना कि मतदाता सूची को दुरुस्त करने का अधिकार पूरी तरह से निर्वाचन आयोग के संवैधानिक दायरे में आता है। इस फैसले से चुनाव आयोग को भविष्य में अन्य राज्यों में भी इसी प्रकार की प्रक्रिया अपनाने की खुली छूट मिल गई है। यह फैसला देश के चुनावी ढांचे की पारदर्शिता के लिए एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

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