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Monday, March 2, 2026
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पाकिस्तान का नया गठबंधन: अमेरिका को बंदरगाह, तुर्की को जमीन — भारत के लिए बढ़ी रणनीतिक चुनौती

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Pakistan-US-Turkey Alliance 2025: दक्षिण एशिया की भू-राजनीति में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। लंबे समय से चीन के प्रभाव में रहा पाकिस्तान अब अमेरिका और तुर्की के साथ अपनी साझेदारी को नई दिशा दे रहा है। यह रणनीतिक समीकरण न केवल भारत के लिए नई सुरक्षा और कूटनीतिक चुनौतियाँ खड़ी कर सकता है, बल्कि क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को भी प्रभावित करेगा।

अमेरिका के लिए खुला पसनी बंदरगाह

आर्थिक संकट और राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रहे पाकिस्तान ने अमेरिका को लुभाने के लिए एक बड़ा प्रस्ताव दिया है। रिपोर्ट्स के अनुसार, इस्लामाबाद ने बलूचिस्तान के पसनी पोर्ट (Pasni Port) को अमेरिकी सहयोग से विकसित करने की पेशकश की है। यह बंदरगाह चीन के ग्वादर पोर्ट से मात्र 100 किलोमीटर की दूरी पर है और भारत-ईरान के संयुक्त चाबहार पोर्ट के भी करीब स्थित है।

सूत्रों के अनुसार, इस परियोजना की कुल लागत लगभग 1.2 अरब डॉलर बताई जा रही है। पाकिस्तान ने अमेरिका को इस क्षेत्र में रेयर अर्थ मिनरल्स (Rare Earth Minerals) तक सीमित पहुंच देने का भी संकेत दिया है। ये खनिज रक्षा, एयरोस्पेस और ग्रीन एनर्जी सेक्टर के लिए बेहद जरूरी हैं।

हालांकि आधिकारिक रूप से कहा गया है कि इस बंदरगाह पर कोई अमेरिकी सैन्य बेस नहीं होगा, लेकिन पसनी का स्थान अमेरिकी रणनीतिक हितों के लिए अत्यंत संवेदनशील है। यह बंदरगाह अफगानिस्तान, ईरान और अरब सागर के समुद्री मार्गों की निगरानी के लिहाज से अहम साबित हो सकता है।

पाकिस्तान-अमेरिका रिश्तों में नई गर्माहट

पाकिस्तान और अमेरिका के रिश्ते हमेशा से उतार-चढ़ाव भरे रहे हैं। शीत युद्ध के दौरान अमेरिका ने पाकिस्तान को सहयोगी माना, लेकिन 9/11 के बाद आतंकवाद विरोधी अभियान के समय दोनों देशों के बीच अविश्वास गहराया।
अब 2025 में यह रिश्ता फिर से गर्म हो रहा है। सितंबर में पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर, प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की बैठक के बाद इस साझेदारी के नए अध्याय की शुरुआत मानी जा रही है।

पाकिस्तान ने अमेरिका को सीमित ड्रोन ऑपरेशन सुविधा देने का भी प्रस्ताव दिया है, जिससे अफगानिस्तान और ईरान पर निगरानी फिर से मजबूत हो सके। यह कदम 2000 के दशक की शम्सी एयरबेस साझेदारी की याद दिलाता है, जिसे 2011 में ओसामा बिन लादेन ऑपरेशन के बाद बंद कर दिया गया था।

तुर्की को कराची में 1000 एकड़ जमीन

अमेरिका के साथ बढ़ते रिश्तों के समानांतर पाकिस्तान ने तुर्की के साथ भी एक नई औद्योगिक साझेदारी को जन्म दिया है। इसी साल तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोआन की पाकिस्तान यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच 24 अहम समझौते हुए जिनमें ड्रोन, रडार सिस्टम और रक्षा तकनीक के संयुक्त उत्पादन पर सहमति बनी।

यही नहीं, पाकिस्तान ने तुर्की को कराची इंडस्ट्रियल पार्क में 1000 एकड़ जमीन मुफ्त में देने की घोषणा की है। यहां एक्सपोर्ट प्रोसेसिंग जोन (EPZ) बनाया जाएगा, जिसमें कर छूट, आसान लॉजिस्टिक्स और खाड़ी व मध्य एशिया तक सीधी शिपिंग की सुविधा दी जाएगी।

विश्लेषकों के अनुसार, यह कदम सिर्फ आर्थिक नहीं बल्कि राजनयिक सौदे का हिस्सा भी है। पिछले वर्ष भारत के “ऑपरेशन सिंदूर” के दौरान तुर्की ने खुले तौर पर पाकिस्तान का समर्थन किया था। अब कराची का यह EPZ उसी समर्थन के ‘इनाम’ के रूप में देखा जा रहा है।

भारत के लिए क्या है खतरा

पाकिस्तान, अमेरिका और तुर्की के इस नए गठजोड़ को भारत के लिए एक कूटनीतिक चुनौती माना जा रहा है।

  • पहला, पसनी पोर्ट की अमेरिकी उपस्थिति भारत-ईरान के चाबहार प्रोजेक्ट की रणनीतिक अहमियत को कम कर सकती है।
  • दूसरा, कराची में तुर्की की औद्योगिक उपस्थिति से रक्षा-साझेदारी का नया आयाम खुल सकता है, जिससे पाकिस्तान की सैन्य क्षमताएं बढ़ेंगी।
  • तीसरा, यह गठबंधन भारत के ‘एक्ट ईस्ट और नेबरहुड फर्स्ट’ नीति के लिए अप्रत्यक्ष दबाव बना सकता है।

विश्लेषकों का मानना है कि चीन, तुर्की और अमेरिका तीनों के अलग-अलग हितों के बीच पाकिस्तान ने खुद को रणनीतिक ब्रोकर के रूप में स्थापित करने की कोशिश शुरू कर दी है। यह संतुलन भारत की विदेश नीति के लिए एक नया परीक्षण होगा।

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