अरावली पर्वतमाला को किस रूप में परिभाषित किया जाए, इसे लेकर केंद्र सरकार, सुप्रीम कोर्ट और कोर्ट द्वारा ही गठित सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी (CEC) के बीच गंभीर मतभेद सामने आए हैं। पर्यावरण मंत्रालय द्वारा प्रस्तावित अरावली की 100 मीटर न्यूनतम ऊंचाई वाली परिभाषा को सुप्रीम कोर्ट ने मंजूरी दे दी, जबकि CEC ने इसका विरोध करते हुए कहा कि उसने इस परिभाषा को मंजूरी नहीं दी है और इसे लागू करना अरावली की पारिस्थितिकी के लिए खतरनाक हो सकता है।
देश की एक महत्वपूर्ण पारिस्थितिक और भौगोलिक संरचना अरावली पर्वतमाला को लेकर एक नया बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। केंद्र सरकार, सुप्रीम कोर्ट और कोर्ट द्वारा ही गठित एक विशेषज्ञ समिति के बीच इस बात को लेकर गंभीर मतभेद हैं कि अरावली की सही परिभाषा क्या होनी चाहिए।
क्या है अरावली पर्वतमाला विवाद?
पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने अक्टूबर में सुप्रीम कोर्ट के सामने अरावली की एक नई परिभाषा पेश की। इसके मुताबिक, कम से कम 100 मीटर ऊंचाई वाले इलाकों को ही अरावली माना जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने 20 नवंबर को इस परिभाषा को स्वीकार कर लिया। हालांकि, कोर्ट द्वारा ही वन और पर्यावरण संबंधी आदेशों की निगरानी के लिए गठित सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी (CEC) इससे सहमत नहीं है।
CEC ने क्यों किया विरोध?
CEC ने स्पष्ट कहा है कि उसने मंत्रालय की इस 100 मीटर वाली परिभाषा को कभी मंजूरी नहीं दी और न ही इसकी समीक्षा की थी। CEC का कहना है कि अरावली को परिभाषित करने के लिए फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया (FSI) द्वारा 2010 में तैयार की गई परिभाषा को ही अपनाया जाना चाहिए।
FSI की परिभाषा में कम से कम 3 डिग्री ढलान वाले इलाकों को शामिल किया गया है, जिससे छोटी और निचली पहाड़ियां भी अरावली के दायरे में आ जाती हैं और संरक्षित रहती हैं।
100 मीटर परिभाषा से क्या खतरे हैं?
कोर्ट के सलाहकार (एमिकस क्यूरी) परमेश्वर ने एक प्रेजेंटेशन के जरिए चेतावनी दी कि 100 मीटर की सीमा लागू होने से अरावली की भौगोलिक निरंतरता टूट जाएगी। इसके चलते कई छोटी पहाड़ियां अरावली के दायरे से बाहर हो जाएंगी और उन्हें खनन के लिए खोला जा सकेगा।
इसका सीधा असर पारिस्थितिकी पर पड़ेगा और थार मरुस्थल के पूर्व की ओर बढ़ने का खतरा बढ़ जाएगा। FSI के एक आंतरिक आकलन के मुताबिक, 100 मीटर परिभाषा लागू होने पर 20 मीटर या उससे ऊंची 12,081 अरावली पहाड़ियों में से 91.3% संरक्षण के दायरे से बाहर हो जाएंगी।
मंत्रालय के दावे और सवाल
पर्यावरण मंत्री ने कहा है कि अरावली के केवल 0.19% हिस्से में ही खनन की अनुमति है। लेकिन मंत्रालय यह स्पष्ट नहीं कर पाया है कि 100 मीटर परिभाषा लागू होने के बाद निचले अरावली क्षेत्रों में खनन और विकास को कैसे रोका जाएगा। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब जमीन पर सीमांकन का काम अभी हुआ भी नहीं है तो मंत्रालय ने कोर्ट को कैसे आश्वस्त किया कि नई परिभाषा से अरावली का दायरा बढ़ेगा।




















