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Monday, March 2, 2026
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India–US Relations: इंटरनेशनल सोलर एलायंस से अमेरिका बाहर, फिर भी भारत को टेंशन नहीं

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इंटरनेशनल सोलर एलायंस से अमेरिका का बाहर होना वैश्विक जलवायु राजनीति में बड़ा बदलाव है। यह कदम भारत–अमेरिका रिश्तों, स्वच्छ ऊर्जा निवेश और वैश्विक शक्ति संतुलन पर दूरगामी असर डाल सकता है। भारत के लिए अब चुनौती है कि वह इस गठबंधन को और मजबूत बनाकर अपने नेतृत्व को साबित करे।

भारत की पहल पर बने इंटरनेशनल सोलर एलायंस (ISA) को एक बड़ा झटका लगा है। अमेरिका ने इस बहुपक्षीय संगठन से बाहर निकलने का फैसला कर लिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump के इस कदम को न केवल वैश्विक जलवायु लक्ष्यों के लिए चुनौती माना जा रहा है, बल्कि इसे भारत और अमेरिका के बीच बीते तीन दशकों में विकसित हुए रणनीतिक रिश्तों में संभावित दरार के रूप में भी देखा जा रहा है। यह फैसला ऐसे समय आया है, जब स्वच्छ ऊर्जा और जलवायु परिवर्तन वैश्विक राजनीति के केंद्र में हैं।

ट्रंप प्रशासन ने एक कार्यकारी आदेश जारी कर भारत द्वारा प्रवर्तित International Solar Alliance से अमेरिका के बाहर होने की औपचारिक घोषणा की है। व्हाइट हाउस का तर्क है कि कई अंतरराष्ट्रीय संगठन अमेरिकी राष्ट्रीय हित, आर्थिक प्राथमिकताओं और संप्रभुता के खिलाफ काम करते हैं। इसी नीति के तहत अमेरिका ने पर्यावरण और स्वच्छ ऊर्जा से जुड़े कई वैश्विक मंचों से दूरी बनानी शुरू कर दी है। ISA से हटना इसी व्यापक नीति का हिस्सा माना जा रहा है।

भारत की प्रतिक्रिया

सूत्रों के अनुसार, भारत ने इस फैसले को लेकर संयमित रुख अपनाया है। नई दिल्ली का संदेश साफ है कि अमेरिका के हटने से ISA का भविष्य प्रभावित नहीं होगा। भारत का मानना है कि यह गठबंधन विकासशील देशों की जरूरतों से जुड़ा है और किसी एक देश की सदस्यता पर निर्भर नहीं करता। प्रधानमंत्री Narendra Modi के ड्रीम प्रोजेक्ट माने जाने वाले इस संगठन को भारत अब फ्रांस और अन्य साझेदार देशों के साथ मिलकर आगे बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रहा है।

क्या है इंटरनेशनल सोलर एलायंस (ISA)

इंटरनेशनल सोलर एलायंस की स्थापना 2015 में पेरिस जलवायु शिखर सम्मेलन (COP21) के दौरान भारत और फ्रांस की संयुक्त पहल से हुई थी। इसका उद्देश्य उष्णकटिबंधीय और विकासशील देशों को सौर ऊर्जा के क्षेत्र में एक साझा मंच प्रदान करना है। ISA का मुख्यालय गुरुग्राम में स्थित है और इसका लक्ष्य 2030 तक सौर ऊर्जा परियोजनाओं में करीब 1 ट्रिलियन डॉलर का निवेश जुटाना है। संगठन का फोकस सस्ती सौर तकनीक, वित्तीय सहायता और तकनीकी सहयोग के जरिए स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देना है। अमेरिका 2021 में इस गठबंधन में शामिल हुआ था।

भारत–अमेरिका रिश्तों पर संभावित असर

विशेषज्ञों का मानना है कि ISA से हटना केवल जलवायु नीति से जुड़ा फैसला नहीं है। यह भारत–अमेरिका संबंधों के उस ढांचे को भी प्रभावित कर सकता है, जिसे बीते 30 वर्षों में व्यापार, रक्षा और रणनीतिक सहयोग के जरिए मजबूत किया गया है। अमेरिका पहले ही पर्यावरण और स्वच्छ ऊर्जा से जुड़े 31 संयुक्त राष्ट्र संगठनों और 35 अन्य अंतर-सरकारी संस्थाओं से बाहर निकल चुका है। इनमें UNFCCC और IPCC जैसे प्रमुख मंच भी शामिल हैं।

चीन को मिला रणनीतिक फायदा?

अमेरिका के पूर्व जलवायु दूत जॉन केरी ने इस फैसले को अमेरिका के लिए आत्मघाती कदम बताया है। उनका कहना है कि इस तरह के निर्णय चीन के लिए रणनीतिक अवसर खोलते हैं। स्वच्छ ऊर्जा और सौर तकनीक के वैश्विक मानक तय करने में अब अमेरिका की भूमिका सीमित हो जाएगी, जिससे चीन और अन्य देश इस खाली जगह को भर सकते हैं। इससे वैश्विक स्तर पर तकनीक, निवेश और नीति निर्माण में शक्ति संतुलन बदल सकता है।

विशेषज्ञों के अनुसार, ISA से बाहर होना अमेरिका की अर्थव्यवस्था के लिए भी नुकसानदेह साबित हो सकता है। क्लीन एनर्जी सेक्टर में आने वाले ट्रिलियन डॉलर के निवेश और लाखों रोजगार के अवसरों से अमेरिका वंचित हो सकता है। इसके अलावा, सौर ऊर्जा से जुड़े वैश्विक नियमों और मानकों को तय करने की प्रक्रिया में अमेरिका की आवाज कमजोर पड़ जाएगी। इसका सीधा लाभ प्रतिस्पर्धी अर्थव्यवस्थाओं को मिलेगा।

भारत के सामने नई कूटनीतिक चुनौती

भारत के लिए यह स्थिति एक बड़ी कूटनीतिक परीक्षा है। ISA को जीवंत और प्रभावी बनाए रखने के लिए अब भारत को फ्रांस, अफ्रीकी देशों और एशियाई साझेदारों के साथ मिलकर फंडिंग, तकनीक और नीति समर्थन के नए रास्ते तलाशने होंगे। भारत की कोशिश रहेगी कि 2030 के लक्ष्यों को अमेरिका की गैरमौजूदगी के बावजूद हासिल किया जाए और ISA को वैश्विक सौर ऊर्जा नेतृत्व का केंद्र बनाए रखा जाए।

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