Supreme Court ने शुक्रवार को दहेज हत्या के एक मामले की सुनवाई के दौरान अत्यंत महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि विवाह एक पवित्र संस्था है जो आपसी विश्वास और सम्मान पर टिकती है, लेकिन दहेज जैसी सामाजिक बुराई ने इस रिश्ते को कारोबारी लेन देन में बदल दिया है। अदालत ने यह टिप्पणी उस समय की जब उसने अपनी पत्नी को ज़हर देने के आरोपी एक व्यक्ति की जमानत रद्द कर दी।
Bench की अगुवाई कर रही जस्टिस बी वी नागरत्ना और जस्टिस आर महादेवन ने कहा कि दहेज हत्या केवल एक व्यक्ति के खिलाफ नहीं बल्कि पूरे समाज के खिलाफ अपराध है। अदालत ने स्पष्ट किया कि असल रूप में विवाह सम्मान और साझेदारी पर आधारित एक पवित्र गठबंधन है। लेकिन हाल के वर्षों में दहेज ने इस रिश्ते में लालच और दबाव को बढ़ावा दिया है।
Court ने कहा कि कई बार दहेज को उपहार या स्वैच्छिक भेंट का नाम देकर छिपाने की कोशिश की जाती है। लेकिन वास्तविकता यह है कि यह सामाजिक प्रतिष्ठा दिखाने और लालच पूरा करने का माध्यम बन चुका है। Bench ने कहा कि दहेज का दानव शादी की पवित्रता को नष्ट कर देता है। इसके कारण महिलाओं पर मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना बढ़ती है और उनकी स्वतंत्रता सीमित हो जाती है।
जमानत रद्द करने का आधार
Supreme Court ने आरोपी की जमानत को ‘‘प्रतिकूल और अव्यावहारिक’’ बताते हुए कहा कि हाई कोर्ट के आदेश में अपराध की गंभीरता को नजरअंदाज किया गया। अदालत ने यह भी कहा कि मृतका द्वारा मृत्यु से पहले दिए गए बयान और दहेज हत्या की वैधानिक धारणा को पूरी तरह अनदेखा कर दिया गया था। अदालत ने आरोपी को तुरंत हिरासत में लेने का निर्देश दिया।
अदालत ने कहा कि दहेज हत्या उस कुप्रथा की सबसे भयावह अभिव्यक्ति है जिसमें एक युवती को उसकी किसी गलती के बिना सिर्फ लालच की वजह से मौत के मुंह में धकेला जाता है। Court ने कहा कि ऐसे अपराध मानव गरिमा की नींव पर हमला हैं और संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन करते हैं।
Supreme Court की इस टिप्पणी ने एक बार फिर दहेज प्रथा पर समाज और परिवारों की सोच को सवालों के घेरे में ला दिया है। अदालत ने साफ कर दिया कि कानून महिलाओं के अधिकारों और सम्मान की रक्षा के लिए है और किसी भी तरह का दहेज अपराध भारी सजा का पात्र है।





















