सनातन धर्म में पूजा और प्रार्थना को बहुत महत्व दिया जाता है। लोग रोजाना भगवान से आशीर्वाद मांगते हैं और कई बार मन में उठी इच्छा के लिए मन्नत भी करते हैं। जब इच्छा पूरी होती है तो लोग अपनी श्रद्धा के अनुसार भगवान को कुछ अर्पित करते हैं। इसी बीच एक भक्त ने प्रेमानंद महाराज से पूछा कि क्या भगवान से कुछ पाने के लिए शर्त रखना सही है। इस सवाल का उन्होंने बहुत सरल और सहज उत्तर दिया।
प्रेमानंद महाराज ने कहा कि भगवान से सौदेबाज़ी करना उचित नहीं है। भगवान बड़े दाता हैं और हम उनके बच्चे हैं। पिता से कोई सौदा नहीं करता बल्कि सीधे अपनी जरूरत बताता है। उन्होंने कहा कि जैसे बच्चा अपने पिता से कहता है कि मुझे सौ रुपये चाहिए और पिता उसे दे देते हैं उसी तरह भगवान से भी सीधी और सच्ची प्रार्थना करनी चाहिए। भगवान से कहना चाहिए कि प्रभु यह मेरी समस्या है कृपया समाधान कीजिए।
महाराज ने कहा कि मन्नत के रूप में भगवान से यह कहना कि यदि यह काम हो गया तो मैं इतना भोग लगाऊंगा यह तरीका सही नहीं है। यह अज्ञान के कारण किया जाता है। उन्होंने समझाया कि भगवान से सीधी बात करनी चाहिए। प्रभु को अपनी परेशानी बताएं और समाधान मांगें। उन्होंने कहा कि ठाकुर जी स्वयं जानते हैं कि भक्त के लिए क्या उचित है। भोग लगाना है तो बिना कहे लगाएं लेकिन मांगें पिता की तरह मांगें।
उनका कहना था कि भगवान जगत के स्वामी हैं और अपने भक्तों की पुकार अवश्य सुनते हैं। इसलिए भक्त को चाहिए कि वह साफ दिल से अपनी बात भगवान के आगे रखे। जब प्रार्थना सच्चे मन से की जाती है तो भगवान भी उसी भाव से कृपा बरसाते हैं। प्रेमानंद महाराज की यह शिक्षा हर भक्त को भक्ति का वास्तविक अर्थ समझाती है।





















