भारत और अमेरिका के बीच हुए नए व्यापार समझौते के बाद भारत के ऊर्जा क्षेत्र में बड़े बदलाव के संकेत मिल रहे हैं। इस समझौते में भारत ने रूस से कच्चे तेल की खरीद धीरे-धीरे बंद करने और अमेरिका व वेनेजुएला से तेल आयात बढ़ाने पर सहमति जताई है। हालांकि भारतीय तेल कंपनियों का कहना है कि इस बदलाव को तुरंत लागू करना व्यावहारिक नहीं है और इसके लिए समय चाहिए।
सूत्रों के मुताबिक, फरवरी में बुक किए गए रूसी कच्चे तेल के कार्गो मार्च में भारत पहुंच रहे हैं। सरकार की ओर से अभी तक रूसी तेल आयात पर रोक का कोई औपचारिक लिखित आदेश जारी नहीं किया गया है। ऐसे में रिफाइनरियां मौजूदा कॉन्ट्रैक्ट्स को पूरा करने की तैयारी में हैं।
इस समझौते के तहत अमेरिका भारतीय उत्पादों पर लगने वाले आयात शुल्क को 50 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत करेगा। इसके बदले में भारत अपनी ऊर्जा खरीद नीति में बदलाव करेगा और रूसी तेल पर निर्भरता कम करेगा। अमेरिका का मकसद रूस के राजस्व को सीमित करना है, ताकि यूक्रेन युद्ध की फंडिंग पर असर पड़े।
रिफाइनिंग सेक्टर के सामने तकनीकी चुनौतियां भी हैं। रूस समर्थित नयारा एनर्जी पूरी तरह रूसी कच्चे तेल पर निर्भर है और इसकी क्षमता करीब चार लाख बैरल प्रतिदिन है। हालांकि अप्रैल में प्रस्तावित मेंटेनेंस शटडाउन के दौरान वहां रूसी तेल का आयात अपने आप शून्य हो सकता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने टैरिफ कटौती का स्वागत किया है, लेकिन रूसी तेल आयात बंद करने पर सीधे तौर पर कोई बयान नहीं दिया। वहीं अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि दोनों देशों के बीच व्यापार और वैश्विक मुद्दों पर व्यापक सहमति बनी है। आने वाले महीनों में यह साफ होगा कि भारत किस तरह चरणबद्ध तरीके से रूसी तेल से दूरी बनाता है।

















