सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को विशेष सघन पुनरीक्षण कार्य में लगे बूथ स्तर के अधिकारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सभी राज्यों को कड़े निर्देश दिए। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने चेतावनी दी कि बीएलओ को धमकाने या उनके काम में बाधा डालने के किसी भी मामले को गंभीरता से लिया जाएगा। यह आदेश एक एनजीओ द्वारा पश्चिम बंगाल में बीएलओ को धमकियां मिलने के आरोपों के बाद आया है।
पीठ ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर देखते हुए स्पष्ट किया कि यह सिर्फ एक राज्य तक सीमित नहीं है। अदालत ने कहा कि चुनाव आयोग के काम में बाधा डालना एक गंभीर मामला है और सभी राज्यों को बीएलओ को पूरी सुरक्षा देनी चाहिए। कोर्ट ने कहा कि अगर चुनाव आयोग को किसी राज्य प्रशासन या पुलिस से सहयोग नहीं मिलता है तो वह सीधे सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकता है।
अदालत ने चुनाव आयोग से कहा कि वह सभी राज्यों में स्थिति का आकलन करे और अगर जरूरत पड़ी तो सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करे। कोर्ट ने यह भी कहा कि वह बीएलओ की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कड़ी कार्रवाई करेगी और इसमें कोई ढिलाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
काम का बोझ और तनाव पर भी हुई चर्चा
इस सुनवाई के दौरान बीएलओ पर काम के बोझ और तनाव के मुद्दे पर भी चर्चा हुई। चुनाव आयोग ने बताया कि एक बीएलओ को 37 दिनों में अधिकतम 1200 मतदाताओं की गणना करनी होती है यानी रोजाना करीब 35 मतदाता। आयोग ने सवाल किया कि क्या यह बहुत अधिक काम है।
न्यायमूर्ति बागची ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा कि यह कोई डेस्क जॉब नहीं है जहां आंकड़े आसानी से भरे जाते हों। बीएलओ को घर-घर जाकर फॉर्म भरने होते हैं और डेटा अपलोड करना होता है जिसमें शारीरिक और मानसिक तनाव हो सकता है। अदालत ने कहा कि वह यह सुनिश्चित करना चाहती है कि जमीनी स्तर पर यह काम बिना किसी रुकावट के हो।
एनजीओ द्वारा पेश सबूतों पर सवाल उठाते हुए न्यायमूर्ति बागची ने पूछा कि क्या सिर्फ एक एफआईआर के आधार पर यह कहा जा सकता है कि यह सिर्फ एक राज्य में हो रहा है। चुनाव आयोग के वकील ने बताया कि पश्चिम बंगाल के अलावा तमिलनाडु और केरल में भी समस्याएं आ रही हैं क्योंकि वहां की राज्य सरकारों ने इस प्रक्रिया का विरोध किया है।

















