बिहार विधानसभा चुनाव (Bihar Election 2025) के दूसरे चरण की 122 सीटों पर वोटिंग से पहले सियासी माहौल पूरी तरह गरम हो गया है। सीमांचल (Seemanchal) और शाहाबाद-मगध (Shahabad-Magadh) इलाकों की सीटों पर इस बार मुकाबला बेहद दिलचस्प हो गया है। इन क्षेत्रों में एनडीए (NDA), महागठबंधन (Mahagathbandhan) और एआईएमआईएम (AIMIM) के बीच त्रिकोणीय जंग देखने को मिल रही है।
सीमांचल की 24 मुस्लिम बहुल सीटों — कटिहार, किशनगंज, अररिया और पूर्णिया — पर ओवैसी फैक्टर ने राजद और कांग्रेस दोनों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। 2020 में इन सीटों में से महागठबंधन को 12, एनडीए को 6 और एआईएमआईएम को 5 सीटें मिली थीं। इस बार ओवैसी की पार्टी और आक्रामक रणनीति के साथ मैदान में है और मुस्लिम युवाओं में उसकी पकड़ पहले से मजबूत हुई है।
तेजस्वी यादव (Tejashwi Yadav) की कोशिश है कि एआईएमआईएम के असर को कम करते हुए मुस्लिम-दलित-ओबीसी (Muslim-Dalit-OBC) गठजोड़ को एकजुट रखा जाए। राजद नेतृत्व लगातार सीमांचल में सभाएं कर रहा है ताकि वोटों का बंटवारा न हो।
शाहाबाद-मगध का जातीय समीकरण बना निर्णायक
शाहाबाद-मगध क्षेत्र की 46 सीटें महागठबंधन के पास थीं जबकि पिछली बार एनडीए 23 सीटों तक सीमित रह गया था। औरंगाबाद, जहानाबाद, अरवल, आरा, बक्सर, सासाराम और गया जैसे जिलों में यादव, कुर्मी, भूमिहार और दलित वोटर निर्णायक भूमिका में हैं।
एनडीए भाजपा-जदयू (BJP-JDU) के पारंपरिक वोट बैंक पर भरोसा कर रहा है, जबकि महागठबंधन बेरोजगारी, महंगाई और स्थानीय विकास जैसे मुद्दों को केंद्र में रखकर माहौल बनाने में जुटा है।
जनसुराज बना तीसरा मोर्चा
प्रशांत किशोर (Prashant Kishor) की पार्टी जनसुराज (Jansuraj) भी इन इलाकों में खुद को तीसरे विकल्प के रूप में पेश कर रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जनसुराज का वोट शेयर भले सीमित हो, लेकिन यह दोनों प्रमुख गठबंधनों के वोट प्रतिशत को प्रभावित कर सकता है।
ओवैसी ने तेजस्वी की मुश्किलें बढ़ाईं
2020 के चुनाव में सीमांचल की पांच सीटें जीतने के बाद एआईएमआईएम के चार विधायक राजद में शामिल हो गए थे। लेकिन इस बार ओवैसी की पार्टी ने जमीनी संगठन मजबूत किया है और मुस्लिम वोट बैंक में धीरे-धीरे पैठ बना रही है। इससे राजद की चिंता बढ़ गई है क्योंकि सीमांचल की सीटें इस बार सत्ता का रास्ता तय कर सकती हैं।
122 सीटों की जंग तय करेगी सत्ता का रास्ता
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि अगर एनडीए सीमांचल और शाहाबाद-मगध में अपना ग्राफ नहीं बढ़ा पाया तो सत्ता तक पहुंचना मुश्किल हो जाएगा। वहीं अगर एआईएमआईएम और महागठबंधन के बीच वोटों का बंटवारा नहीं हुआ, तो तेजस्वी यादव की राह सत्ता की ओर और आसान हो सकती है।





















