मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित ऐतिहासिक भोजशाला को लेकर विश्व हिंदू परिषद ने बड़ा ऐलान किया है। संगठन ने कहा है कि अगले आठ वर्षों के भीतर कानूनी प्रक्रिया पूरी करने के बाद भोजशाला में वाग्देवी मां सरस्वती का एक भव्य मंदिर बनाया जाएगा। विश्व हिंदू परिषद का दावा है कि वर्ष 2034 में भोजशाला के निर्माण के एक हजार वर्ष पूरे हो जाएंगे और उसी समय यहां मंदिर निर्माण का लक्ष्य रखा गया है।
यह घोषणा बसंत पंचमी के अवसर पर भोजशाला परिसर में आयोजित कार्यक्रम के दौरान की गई। विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक कुमार ने सभा को संबोधित करते हुए कहा कि भोजशाला में प्रस्तावित मंदिर अयोध्या में बने राम मंदिर की तर्ज पर भव्य होगा। उन्होंने कहा कि वाग्देवी की वही मूर्ति यहां पुनः प्रतिष्ठित की जाएगी, जो फिलहाल लंदन के एक संग्रहालय में रखी हुई बताई जा रही है।
कार्यक्रम के दौरान आलोक कुमार ने कहा कि जिस देवी की इस स्थल पर प्रतिष्ठा थी, उनकी मूल प्रतिमा आज भी लंदन के एक म्यूजियम में मौजूद है। उन्होंने इसे भारत वापस लाने की आवश्यकता पर जोर दिया। उनका कहना था कि इसके लिए लंबित अदालती मामलों में सफलता हासिल करनी होगी और फिर मंदिर को मां सरस्वती की गरिमा के अनुरूप स्थापित किया जाएगा।
वीएचपी का दावा है कि भोजशाला में वाग्देवी का मंदिर वर्ष 1034 में बनाया गया था। इस आधार पर अगले आठ वर्षों में इसके एक हजार वर्ष पूरे हो जाएंगे। संगठन का कहना है कि 2034 में इस ऐतिहासिक अवसर पर मां सरस्वती की भव्य मूर्ति को फिर से उसी स्थान पर प्रतिष्ठित किया जाना चाहिए।
सभा को संबोधित करते हुए आलोक कुमार ने लोगों से संकल्प लेने की अपील की। उन्होंने कहा कि आने वाले वर्षों में कानूनी लड़ाई को पूरा किया जाएगा, लंदन से मूर्ति को भारत लाया जाएगा और 2034 में भोजशाला में भव्य मंदिर का निर्माण कर मूर्ति की पुनः प्रतिष्ठा की जाएगी।
वीएचपी नेता ने यह भी दावा किया कि भोजशाला केवल एक मंदिर नहीं था, बल्कि यह एक गुरुकुल भी था। यहां बड़ी संख्या में छात्र वेद, पुराण और अन्य प्राचीन ग्रंथों का अध्ययन करते थे। उन्होंने कहा कि यदि यहां फिर से मंदिर और गुरुकुल की स्थापना होती है तो धार एक बार फिर ज्ञान और विद्या का प्रमुख केंद्र बन सकता है।
इससे पहले बसंत पंचमी के मौके पर भोजशाला में पांच दिवसीय धार्मिक आयोजन की शुरुआत हुई। सुबह से ही बड़ी संख्या में श्रद्धालु पूजा-अर्चना के लिए पहुंचे। सदियों पुराने हवन कुंड में आहुतियां दी गईं और पूरे परिसर में धार्मिक गतिविधियां देखने को मिलीं।
गौरतलब है कि भोजशाला को लेकर लंबे समय से विवाद चला आ रहा है। हिंदू समुदाय इसे वाग्देवी मां सरस्वती का मंदिर मानता है, जबकि मुस्लिम समुदाय इसे कमाल मौला मस्जिद के रूप में देखता है। यह ऐतिहासिक परिसर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित है और इससे जुड़ा मामला फिलहाल अदालत में लंबित है।
एएसआई की व्यवस्था के अनुसार, हर मंगलवार को यहां हिंदू समुदाय को पूजा की अनुमति होती है, जबकि शुक्रवार को दोपहर में मुस्लिम समुदाय नमाज होती है। बसंत पंचमी के दिन सूर्योदय से सूर्यास्त तक हिंदू समुदाय वाग्देवी की तस्वीर की पूजा करता है। हिंदू संगठनों का कहना है कि यहां स्थापित रही देवी सरस्वती की मूल प्रतिमा अंग्रेज अपने साथ ले गए थे, जो अब लंदन के संग्रहालय में है।

















