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300 रुपये के रिश्वत मामले में पूर्व पटवारी को राहत, हाई कोर्ट ने सरकार की अपील खारिज की

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मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने करीब 30 साल पुराने 300 रुपये के रिश्वत मामले में पूर्व पटवारी मुन्ना लाल की दोषमुक्ति बरकरार रखी है। जस्टिस संजय एस. कलगांवकर की एकलपीठ ने राज्य सरकार की अपील खारिज कर दी। जिला अदालत ने दिसंबर 1997 में मुन्ना लाल को बरी किया था।

हाई कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष भरोसेमंद साक्ष्यों से यह साबित नहीं कर पाया कि 300 रुपये रिश्वत के तौर पर मांगे और स्वीकार किए गए थे। अदालत ने रिकॉर्डिंग, शिकायतकर्ता के बयानों और राजस्व बकाये से जुड़े तथ्यों पर विचार किया।

1996 में लोकायुक्त ने की थी कार्रवाई

मामला सागर जिले के खुरई क्षेत्र का है। वर्ष 1996 में तत्कालीन पटवारी मुन्ना लाल पर डुप्लीकेट भू-अधिकार एवं ऋण पुस्तिका जारी करने के बदले रिश्वत मांगने का आरोप लगा था। खुरई निवासी वीर सिंह की शिकायत पर लोकायुक्त ने कार्रवाई की थी। 17 अक्टूबर को मुन्ना लाल को 300 रुपये लेते हुए पकड़ा गया था।

जिला अदालत ने मामले की सुनवाई के बाद दिसंबर 1997 में मुन्ना लाल को बरी कर दिया। राज्य सरकार ने इस फैसले को चुनौती देते हुए 1998 में जबलपुर हाई कोर्ट में अपील दायर की थी। हाई कोर्ट में अभियोजन को यह साबित करना था कि रकम रिश्वत के रूप में मांगी और स्वीकार की गई थी।

रिकॉर्डिंग और बयानों में विसंगतियां

हाई कोर्ट ने कथित रिश्वत मांग की रिकॉर्डिंग को पर्याप्त रूप से प्रमाणित नहीं पाया। अदालत के मुताबिक, जिला अदालत में मूल रिकॉर्डिंग का सत्यापन नहीं हुआ था, आरोपी की आवाज की पहचान नहीं कराई गई और रिकॉर्डिंग की पूर्णता व शुद्धता साबित करने के लिए पर्याप्त आधार पेश नहीं किए गए। इसलिए उसकी लिखित प्रतिलिपि को भरोसेमंद साक्ष्य नहीं माना जा सका।

पीठ ने शिकायतकर्ता वीर सिंह के बयानों में भी अंतर पाया। अलग-अलग मौकों पर कथित मांग की रकम 450 और 500 रुपये बताई गई थी। रिश्वत मांगते समय कौन-कौन मौजूद था, इस बारे में भी बयान एक जैसे नहीं थे। अदालत ने कहा कि इन विसंगतियों से अभियोजन के दावे की विश्वसनीयता प्रभावित होती है।

सुनवाई के दौरान राजस्व रिकॉर्ड का भी उल्लेख हुआ। रिकॉर्ड के अनुसार, वीर सिंह पर 325 रुपये और ब्याज की सरकारी राशि बकाया थी। गवाहों और दस्तावेजों से यह संभावना सामने आई कि बरामद 300 रुपये उस बकाये के भुगतान से जुड़े हो सकते थे। अदालत ने साक्ष्यों का मूल्यांकन करते समय इस तथ्य को प्रासंगिक माना।

पीठ ने कहा कि केवल रकम बरामद होना और फिनॉल्फ्थेलीन परीक्षण का नतीजा रिश्वत मांगने और अवैध रूप से रकम स्वीकार करने का अपराध साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। जिला अदालत का दोषमुक्ति का निष्कर्ष साक्ष्यों पर आधारित था, इसलिए उसमें हस्तक्षेप का आधार नहीं बनता। हाई कोर्ट ने राज्य सरकार की अपील खारिज कर दी।

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