भारत निर्वाचन आयोग (ECI) को लेकर सामने आई मीडिया रिपोर्टों के बाद चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) की भूमिका पर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने भी चुनाव प्रक्रिया और कथित वोट चोरी के आरोपों को लेकर चुनावी व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं।
कुछ मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया है कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व में आयोग के कामकाज और मतदाता सूची से जुड़े डेटा के प्रबंधन को लेकर कई मौकों पर लिखित आपत्तियां दर्ज कराई थीं। हालांकि, इन दावों और उनके संदर्भ को संबंधित आधिकारिक रिकॉर्ड तथा सभी पक्षों के जवाब के साथ देखना जरूरी है।
इसी बीच विपक्ष की ओर से मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने के लिए संसद में महाभियोग प्रस्ताव लाने की बात सामने आई है। रिपोर्टों के अनुसार, प्रस्ताव की कानूनी प्रक्रिया और मसौदे पर विपक्षी दलों के बीच चर्चा की जा रही है।
ऐसे में यह समझना जरूरी है कि भारत के संविधान और संबंधित कानून के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की वास्तविक संवैधानिक प्रक्रिया क्या है और संसद में महाभियोग प्रस्ताव आने के बाद क्या होता है।
मुख्य चुनाव आयुक्त का पद क्यों महत्वपूर्ण है?
भारत निर्वाचन आयोग देश में लोकसभा, विधानसभा और राष्ट्रपति तथा उपराष्ट्रपति के चुनावों के संचालन की संवैधानिक जिम्मेदारी निभाता है। निर्वाचन आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त के अलावा अन्य चुनाव आयुक्त भी होते हैं। आयोग के निर्णय उसके निर्धारित संवैधानिक और कानूनी ढांचे के तहत लिए जाते हैं।
मुख्य चुनाव आयुक्त को विशेष संवैधानिक सुरक्षा प्राप्त है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि चुनाव आयोग स्वतंत्र रूप से अपना काम कर सके और किसी सरकार या राजनीतिक दबाव के कारण उसके कामकाज पर असर न पड़े। इसी वजह से CEC को पद से हटाने की प्रक्रिया सामान्य सरकारी अधिकारियों की तुलना में काफी अलग और कठिन है।
चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति कैसे होती है?
मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं। नियुक्ति की प्रक्रिया मौजूदा कानून में निर्धारित चयन व्यवस्था के अनुसार होती है। 2023 में संसद द्वारा पारित Chief Election Commissioner and Other Election Commissioners (Appointment, Conditions of Service and Term of Office) Act के तहत नियुक्ति से संबंधित प्रावधान निर्धारित किए गए हैं।
मौजूदा व्यवस्था में चयन समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता, प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री शामिल होते हैं। चयन समिति की सिफारिश के आधार पर राष्ट्रपति मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति करते हैं।
कानून के अनुसार मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों का कार्यकाल अधिकतम छह वर्ष या 65 वर्ष की आयु तक, जो भी पहले हो, निर्धारित किया गया है। इसका उद्देश्य चुनाव आयोग के सदस्यों को एक निश्चित कार्यकाल के साथ संवैधानिक जिम्मेदारी निभाने की व्यवस्था देना है।
मुख्य चुनाव आयुक्त को कैसे हटाया जा सकता है?
CEC को हटाने की प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 324(5) में निर्धारित है। मुख्य चुनाव आयुक्त को उसी तरीके और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जिन आधारों और प्रक्रिया के तहत सुप्रीम कोर्ट के किसी जज को हटाया जाता है। इसका अर्थ है कि केवल राजनीतिक असहमति या किसी निर्णय से नाराजगी CEC को हटाने का संवैधानिक आधार नहीं है।
हटाने के लिए सिद्ध कदाचार (proved misbehaviour) या अक्षमता (incapacity) का आधार होना आवश्यक है। कदाचार का अर्थ गंभीर अनुचित आचरण से जुड़ा हो सकता है। किसी विशेष मामले में कदाचार सिद्ध हुआ है या नहीं, यह निर्धारित संवैधानिक और संसदीय प्रक्रिया के तहत तय किया जाता है।
अक्षमता का सामान्य अर्थ ऐसी स्थिति से है जिसमें संबंधित व्यक्ति अपने संवैधानिक पद की जिम्मेदारियों को निभाने में असमर्थ हो। हालांकि, किसी आरोप को केवल लगाए जाने भर से कदाचार या अक्षमता सिद्ध नहीं मानी जाती। इसके लिए निर्धारित जांच और संसदीय प्रक्रिया पूरी करनी होती है।
क्या अन्य चुनाव आयुक्तों को भी इसी तरह हटाया जाता है?
मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों के लिए हटाने की संवैधानिक सुरक्षा अलग है। अन्य चुनाव आयुक्तों और क्षेत्रीय आयुक्तों को राष्ट्रपति मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश के बिना पद से नहीं हटा सकते। इस व्यवस्था का उद्देश्य निर्वाचन आयोग की संस्थागत स्वतंत्रता को सुरक्षित रखना है।
महाभियोग प्रस्ताव संसद में कैसे शुरू होता है?
मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया संसद में प्रस्ताव के जरिए शुरू हो सकती है। इसके लिए सांसदों को CEC के खिलाफ कदाचार या अक्षमता से संबंधित आरोपों का उल्लेख करते हुए नोटिस देना होता है।
लोकसभा में इस तरह के प्रस्ताव के लिए कम से कम 100 सांसदों के हस्ताक्षर और राज्यसभा में कम से कम 50 सांसदों के हस्ताक्षर की आवश्यकता होती है। प्रस्ताव स्वीकार किए जाने के बाद आरोपों की जांच के लिए निर्धारित प्रक्रिया शुरू होती है।
जांच के बाद क्या होता है?
यदि प्रस्ताव प्रक्रिया में आगे बढ़ता है, तो आरोपों की जांच की जाती है। जांच का उद्देश्य यह निर्धारित करना होता है कि लगाए गए कदाचार या अक्षमता के आरोप साबित होते हैं या नहीं। यदि जांच में आरोप सिद्ध नहीं होते, तो हटाने की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ती। यदि आरोप सिद्ध होते हैं, तो संसद के दोनों सदनों में हटाने का प्रस्ताव विचार के लिए आता है।
मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए संसद के दोनों सदनों में प्रस्ताव को विशेष बहुमत से पारित करना होता है। इसके लिए सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत, और उपस्थित तथा मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई मत आवश्यक होते हैं। इसलिए केवल साधारण बहुमत से CEC को पद से हटाया नहीं जा सकता। दोनों सदनों में आवश्यक संवैधानिक बहुमत हासिल करना जरूरी है।
यदि लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदनों में संवैधानिक रूप से आवश्यक बहुमत से प्रस्ताव पारित हो जाता है, तो इसके बाद राष्ट्रपति मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने का आदेश जारी करते हैं। इस तरह CEC को हटाने की पूरी प्रक्रिया केवल किसी एक सदन या किसी एक राजनीतिक दल के निर्णय से पूरी नहीं होती। इसमें संविधान में निर्धारित कई चरण शामिल हैं।
पहले भी ज्ञानेश कुमार को हटाने का प्रस्ताव आया था?
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने को लेकर इससे पहले भी विपक्षी दलों की ओर से संसद में प्रस्ताव लाने की खबरें सामने आई थीं। रिपोर्टों के अनुसार, मार्च 2026 में विपक्षी दलों ने लोकसभा और राज्यसभा में उनके खिलाफ हटाने की प्रक्रिया शुरू करने के लिए नोटिस दिए थे। इन प्रस्तावों पर बड़ी संख्या में सांसदों के हस्ताक्षर होने का भी दावा किया गया था।
विपक्ष की ओर से चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, कथित पक्षपात और चुनावी प्रक्रिया से संबंधित कई आरोप लगाए गए थे। इन आरोपों पर राजनीतिक विवाद भी सामने आया था। बाद में अप्रैल 2026 में दोनों सदनों के पीठासीन अधिकारियों की ओर से इन प्रस्तावों को स्वीकार नहीं किया गया।
यहां यह ध्यान रखना जरूरी है कि किसी राजनीतिक दल या सांसद द्वारा लगाए गए आरोप अपने आप में सिद्ध तथ्य नहीं होते। आरोपों की सत्यता निर्धारित करने के लिए संबंधित संवैधानिक और कानूनी प्रक्रिया महत्वपूर्ण होती है।
अब क्या हो सकता है?
मौजूदा विवाद में यदि विपक्ष वास्तव में नया प्रस्ताव पेश करता है, तो सबसे पहले यह देखा जाएगा कि प्रस्ताव संवैधानिक और संसदीय नियमों के अनुसार स्वीकार करने योग्य है या नहीं। इसके बाद ही प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है।
CEC को हटाने के मामले में केवल राजनीतिक बयान या संसद में प्रस्ताव का नोटिस पर्याप्त नहीं है। संविधान के तहत निर्धारित जांच और दोनों सदनों में आवश्यक विशेष बहुमत की प्रक्रिया पूरी करना जरूरी है।
















