इंदौर में आयोजित अभ्यास मंडल की 66वीं ग्रीष्मकालीन व्याख्यान माला में राज्यसभा सांसद और प्रख्यात चिंतक मनोज कुमार झा ने राजनीति की बदलती भाषा और लोकतांत्रिक संवाद पर तीखी टिप्पणी की। ‘राजनीति की भाषा और भाषा की राजनीति’ विषय पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि देश में राजनीतिक संवाद का स्तर लगातार गिरता जा रहा है।
मनोज झा ने कहा कि आज की राजनीति में आक्रामकता को नेतृत्व का प्रतीक मान लिया गया है। उन्होंने टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि आज महात्मा गांधी भी चुनाव मैदान में उतरते तो शायद चुनाव हार जाते या फिर चुनाव लड़ने से ही बचते।
राजनीति की भाषा पर चिंता
उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में भाषा का स्तर गिरना बेहद गंभीर विषय है और इसके लिए केवल नेता ही नहीं बल्कि समाज भी जिम्मेदार है। उन्होंने कहा कि पहले सार्वजनिक जीवन में अपशब्दों को स्वीकार नहीं किया जाता था, लेकिन अब वही भाषा राजनीतिक पहचान बनती जा रही है।

मनोज झा ने कहा कि राजनीति में वोट हासिल करने के लिए समाज को बांटने वाली भाषा का इस्तेमाल बढ़ गया है। उन्होंने चेतावनी दी कि ऐसी सोच सामाजिक सौहार्द को नुकसान पहुंचा रही है।
लोकतंत्र और संविधान पर भी बोले
सांसद ने कहा कि आज सरकार की आलोचना को देश विरोध से जोड़ दिया जाता है, जबकि लोकतंत्र में असहमति स्वाभाविक है। उन्होंने कहा कि भारत किसी एक व्यक्ति की पहचान नहीं बल्कि विशाल और साझा सोच का प्रतीक है।
उन्होंने ‘घुसपैठिया’ और ‘अर्बन नक्सल’ जैसे राजनीतिक शब्दों का जिक्र करते हुए कहा कि इनका इस्तेमाल समाज में विभाजन पैदा करने के लिए किया जा रहा है। उनके अनुसार लोकतंत्र में संस्थाओं और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा बेहद जरूरी है।

हिंदी और भाषा विवाद पर टिप्पणी
मनोज झा ने कहा कि हिंदी केवल सरकारी अभियानों से नहीं बल्कि जनसंपर्क और लोक व्यवहार से बड़ी भाषा बनी है। उन्होंने कहा कि भाषा जीवन का माध्यम है, लेकिन आज राजनीति में भाषा से ज्यादा EVM पर ध्यान दिया जा रहा है।
कार्यक्रम में अतिथियों का स्वागत श्याम सुंदर यादव, रामबाबू अग्रवाल, अन्ना दुराई, नेहा जैन, इशाक चौधरी और अंजेश ने किया। संचालन मनीष भालेराव ने किया जबकि आभार प्रदर्शन अरविंद तिवारी ने किया।
अभ्यास मंडल की व्याख्यान माला के अगले सत्र में भाजपा के मध्यप्रदेश प्रभारी डॉ. महेंद्र सिंह ‘भारत दृष्टि 2047’ विषय पर संबोधित करेंगे।
















