मध्य प्रदेश में गाय के गोबर और गोमूत्र (पंचगव्य) से कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के इलाज पर रिसर्च के नाम पर सरकारी फंड के कथित दुरुपयोग का मामला सामने आया है। यह मामला जबलपुर स्थित नानाजी देशमुख पशु चिकित्सा विज्ञान विश्वविद्यालय से जुड़ा है, जहां वर्ष 2011 में एक महत्वाकांक्षी रिसर्च प्रोजेक्ट शुरू किया गया था।
इस प्रोजेक्ट का उद्देश्य पंचगव्य फॉर्मूलेशन की मदद से कैंसर सहित अन्य गंभीर बीमारियों के इलाज पर वैज्ञानिक शोध करना और किसानों को इससे जुड़ी ट्रेनिंग देना था। इसके लिए विश्वविद्यालय ने राज्य सरकार से करीब 8 करोड़ रुपये की मांग की थी, जिसमें से सरकार ने 3.5 करोड़ रुपये जारी किए।
15 साल बाद भी नतीजा शून्य, जांच के आदेश
करीब 15 साल बीत जाने के बावजूद जब इस रिसर्च से कोई ठोस नतीजा सामने नहीं आया, तो प्रशासन ने मामले की जांच कराने का फैसला किया। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, जबलपुर के संभाग आयुक्त को शिकायत मिलने के बाद अतिरिक्त कलेक्टर रघुवर मरावी की अध्यक्षता में एक जांच समिति गठित की गई। जांच पूरी होने के बाद रिपोर्ट कलेक्टर को सौंप दी गई है।
15–20 लाख का सामान, कागजों में 2 करोड़
जांच रिपोर्ट में सामने आया कि रिसर्च के लिए जारी 3.5 करोड़ रुपये में से 1.9 करोड़ रुपये केवल गोबर, गोमूत्र, बर्तन, कच्चा माल और छोटी-मोटी मशीनों की खरीदी पर खर्च दिखाए गए। जबकि इन सभी सामानों का वास्तविक बाजार मूल्य महज 15 से 20 लाख रुपये बताया गया है। रिपोर्ट में मशीनों की कीमत बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने और खरीद प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं।
रिसर्च के नाम पर हवाई यात्राएं और गाड़ियां
जांच में यह भी सामने आया कि वर्ष 2012 से 2018 के बीच रिसर्च टीम के सदस्यों ने 24 हवाई यात्राएं कीं। इन यात्राओं को गोवा और बेंगलुरु जैसे शहरों में रिसर्च विज़िट बताया गया। इसके अलावा:
- 7.5 लाख रुपये एक कार की खरीदी पर
- लगभग 7.5 लाख रुपये ईंधन और मेंटेनेंस पर
- 3.5 लाख रुपये मजदूरी पर
- 15 लाख रुपये टेबल, फर्नीचर और इलेक्ट्रॉनिक सामान पर खर्च दिखाया गया।
जांच समिति ने इन खर्चों को रिसर्च से असंबंधित और गैर-जरूरी बताया है।
कैंसर इलाज और ट्रेनिंग—कहीं रिकॉर्ड नहीं
जांच अधिकारी रघुवर मरावी के अनुसार, प्रोजेक्ट के तहत कैंसर जैसी बीमारियों के इलाज पर पंचगव्य रिसर्च और किसानों को ट्रेनिंग देने की बात कही गई थी, लेकिन रिपोर्ट में न तो किसी ठोस वैज्ञानिक अध्ययन का रिकॉर्ड मिला और न ही यह स्पष्ट हुआ कि किसे कब और कैसी ट्रेनिंग दी गई।
यूनिवर्सिटी का बचाव
इन आरोपों पर प्रतिक्रिया देते हुए विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार डॉ. एस.एस. तोमर ने सभी गड़बड़ियों से इनकार किया है। उनका कहना है कि यह प्रोजेक्ट वर्ष 2012 से पूरी पारदर्शिता और नियमों के तहत चल रहा है और किसी तरह की अनियमितता नहीं हुई है।

















