बांग्लादेश में राष्ट्रकवि काजी नजरुल इस्लाम की समाधि के पास युवा कट्टरपंथी नेता शरीफ उस्मान हादी को दफनाए जाने का सरकारी फैसला एक बड़े सांस्कृतिक और राजनीतिक विवाद में तब्दील हो गया है। अंतरिम सरकार के इस कदम को देश के एक बड़े तबके ने राष्ट्र की धर्मनिरपेक्ष विरासत के साथ खिलवाड़ और एक सुनियोजित अपमान करार दिया है।
काजी नजरुल इस्लाम को बांग्लादेश का ‘विद्रोही कवि’ माना जाता है। उनकी कविता और गीत सांप्रदायिक सौहार्द और सभी प्रकार की कट्टरता के खिलाफ थे। उन्होंने हिंदू और इस्लामी दोनों ही रचनात्मक परंपराओं को समान रूप से अपनाया। नजरुल स्पष्ट रूप से धर्मनिरपेक्ष और समावेशी बांग्लादेश के प्रतीक रहे हैं।
कट्टर इस्लामी नेता हादी की कब्र पर विवाद
वहीं शरीफ उस्मान हादी एक कट्टर इस्लामी राष्ट्रवादी नेता के तौर पर जाने जाते थे। वह बांग्लादेश को एक इस्लामी राष्ट्र के रूप में देखने के पक्षधर थे और पूर्व की अवामी लीग सरकारों की धर्मनिरपेक्ष नीतियों के मुखर विरोधी रहे। दोनों के विचारों में आकाश-पाताल का अंतर था।
आलोचकों का मानना है कि जिस कट्टरता और साम्प्रदायिकता का नजरुल ने जीवनभर विरोध किया उसी विचारधारा के प्रतीक व्यक्ति को उनकी शांतिस्थली के पास जगह देना एक सांकेतिक जीत दिलाने जैसा है। यह फैसला बांग्लादेश में बढ़ते कट्टरपंथी प्रभाव और राजनीतिक बदलाव का संकेत देता है।
यह विवाद उस समय और भी गहरा गया है जब हाल ही में संविधान संशोधन के जरिए राष्ट्रपिता शेख मुजीबुर्रहमान के खिताब को हटाया गया था। कई लोग इन घटनाओं को मिलाकर देख रहे हैं और मानते हैं कि देश की धर्मनिरपेक्ष और उदार पहचान को जानबूझकर कमजोर किया जा रहा है।

















