महाराष्ट्र सरकार ने एक बड़े फैसले में मुस्लिम समुदाय को सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में दिए जाने वाले 5 प्रतिशत आरक्षण को पूरी तरह रद्द कर दिया है। सरकार की ओर से मंगलवार को एक आधिकारिक सरकारी प्रस्ताव यानी गवर्नमेंट रेजोल्यूशन जारी किया गया जिसमें इस आरक्षण को समाप्त करने की घोषणा की गई। इस फैसले के साथ ही विशेष पिछड़ा वर्ग श्रेणी के तहत मुसलमानों को मिलने वाला यह कोटा अब पूरी तरह इतिहास बन गया है।
दरअसल इस आरक्षण की शुरुआत जुलाई 2014 में हुई थी जब महाराष्ट्र में कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की गठबंधन सरकार ने एक अध्यादेश के जरिए मराठा समुदाय को 16 प्रतिशत और मुस्लिम समुदाय को 5 प्रतिशत आरक्षण देने का फैसला किया था। इस अध्यादेश में मुसलमानों को सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग की विशेष श्रेणी यानी एसबीसी-ए में रखा गया था।
हालांकि यह अध्यादेश कानूनी पचड़े में फंस गया और मुंबई हाईकोर्ट ने 14 नवंबर 2014 को इस पर रोक लगा दी। इसके बाद सरकार ने निर्धारित समय सीमा यानी 23 दिसंबर 2014 तक इस अध्यादेश को कानून का रूप नहीं दिया जिसके कारण यह अपने आप ही निष्प्रभावी हो गया। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी एक विशेष याचिका पर सुनवाई करते हुए इस आरक्षण को असंवैधानिक घोषित कर दिया था।
इतने सब के बावजूद महाराष्ट्र सरकार ने अब तक पुराने सरकारी प्रस्तावों को आधिकारिक रूप से रद्द नहीं किया था जिससे कानूनी अस्पष्टता बनी हुई थी। अब नए सरकारी आदेश के जरिए 2014 से पहले और उस दौरान जारी किए गए सभी निर्णयों और परिपत्रों को औपचारिक रूप से रद्द कर दिया गया है। साथ ही सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि अब विशेष पिछड़ा वर्ग के मुसलमानों को जाति प्रमाण पत्र और नॉन क्रीमी लेयर प्रमाण पत्र जारी करना भी बंद कर दिया गया है।
यह फैसला राजनीतिक रूप से काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है और इस पर अलग-अलग दलों की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। एक तरफ जहां सत्तारूढ़ दल इसे कानूनी प्रक्रिया का पालन बता रहे हैं वहीं विपक्षी दल इसे मुस्लिम समुदाय के साथ अन्याय करार दे रहे हैं। फिलहाल इस मुद्दे पर सियासी बहस जारी है और आने वाले दिनों में इस पर और प्रतिक्रियाएं आने की उम्मीद है।

















