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Oil Export Restrictions: भारत से लौटे पुतिन के लिए बुरी खबर, रूस के समुद्री तेल निर्यात पर लग सकता है फुल बैन

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Oil Export Restrictions: भारत दौरा खत्म करने के बाद अब राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के लिए नई मुश्किल खड़ी हो सकती है। रिपोर्ट्स के मुताबिक G7 और यूरोपीय संघ रूस के समुद्री तेल व्यापार पर अब तक का सबसे कठोर प्रतिबंध लगाने की तैयारी में हैं। यह फैसला रूस की युद्ध अर्थव्यवस्था पर सीधा प्रहार होगा क्योंकि रूसी बजट का बड़ा हिस्सा तेल राजस्व से ही आता है।

Reuters की एक विशेष रिपोर्ट ने खुलासा किया है कि पश्चिमी देश ‘फुल मारिटाइम सर्विसेज बैन’ यानी सभी समुद्री सेवाओं पर पूर्ण रोक लगाने की योजना बना रहे हैं। यह प्रतिबंध मौजूदा प्राइस-कैप तंत्र को पूरी तरह अप्रासंगिक कर देगा। अभी 60 डॉलर प्रति बैरल की सीमा के तहत रूस पश्चिमी शिपिंग और बीमा सेवाओं का उपयोग कर पाता है।

2022 में यूक्रेन युद्ध की शुरुआत के बाद G7–EU ने यही सिस्टम लागू किया था। लेकिन समय के साथ मॉस्को ने ‘शैडो फ्लीट’ नाम की एक समानांतर जहाजी व्यवस्था खड़ी कर ली। पुराने और अस्पष्ट स्वामित्व वाले जहाजों से रूस ने बड़ी मात्रा में तेल भारत और चीन जैसे देशों तक पहुँचाया।

रिपोर्ट के अनुसार, वर्तमान में रूस के तेल निर्यात का 44% हिस्सा इसी शैडो फ्लीट से जाता है, जबकि 38% अब भी G7–EU–ऑस्ट्रेलिया के जहाजों से। यही कारण है कि पश्चिमी देशों को लगता है कि मौजूदा प्राइस कैप अब “कागजी शेर” बन गया है। सितंबर 2025 में EU और कनाडा ने इसे घटाकर 47.6 डॉलर कर दिया, लेकिन ट्रंप प्रशासन ने इसे प्रभावी मानने से इनकार कर दिया था।

नई योजना लागू हुई तो क्या होगा?

नई योजना यदि लागू होती है तो रूस के किसी भी जहाज को पश्चिमी टैंकर, बीमा कंपनियां या पंजीकरण सेवाएं उपलब्ध नहीं होंगी। इसका मतलब यह है कि रूस को एशिया के लिए होने वाले तेल निर्यात में भारी बाधा आएगी। रूस का एक तिहाई से अधिक तेल भारत और चीन जैसे देशों तक यूरोपीय जहाजों के माध्यम से पहुँचता है। विशेषकर ग्रीस, साइप्रस और माल्टा के जहाजों से। इस आपूर्ति चेन पर रोक रूस के लिए बड़ा झटका साबित हो सकती है।

EU इस प्रस्ताव को अपने आगामी 20वें प्रतिबंध पैकेज में शामिल करना चाहता है, जो 2026 की शुरुआत में लागू हो सकता है। हालांकि इस कदम के लिए G7 की सामूहिक मंजूरी जरूरी है। ब्रिटेन और अमेरिका इस प्रस्ताव के मुख्य समर्थक बताए जा रहे हैं। यूरोपीय आयोग चाह रहा है कि यह फैसला G7 की सहमति के बाद ही आगे बढ़े ताकि इसे लागू करने में कोई तकनीकी बाधा न आए।

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