न्यायमूर्ति बीआर गवई का लगभग छह महीने का कार्यकाल शनिवार को समाप्त हो गया। इस छोटे से कार्यकाल में उन्होंने उच्च न्यायालयों में नई नियुक्तियों के जरिए सामाजिक प्रतिनिधित्व को मजबूत किया। इस दौरान विभिन्न उच्च न्यायालयों में अनुसूचित जाति वर्ग के 10 न्यायाधीश और ओबीसी तथा पिछड़े वर्ग से 11 न्यायाधीश नियुक्त किए गए।
गवई देश के पहले बौद्ध और दूसरे दलित प्रधान न्यायाधीश रहे। उन्होंने कॉलेजियम की अगुवाई करते हुए 129 नाम सरकार को भेजे थे, जिनमें से 93 नामों को मंजूरी मिली।
इन महीनों में शीर्ष अदालत में भी पांच नए न्यायाधीश जुड़े। इनमें न्यायमूर्ति एनवी अंजारिया, विजय बिश्नोई, एएस चंदुरकर, आलोक अराधे और विपुल मनुभाई पंचोली शामिल हैं। उच्चतम न्यायालय की वेबसाइट पर दर्ज आंकड़ों के अनुसार गवई के कार्यभार संभालने के बाद मंजूर हुए 93 नामों में 13 अल्पसंख्यक समुदायों से और 15 महिलाएं शामिल थीं। इनमें 49 नियुक्तियां बार से हुईं, जबकि बाकी न्यायिक सेवा से आईं।
न्यायमूर्ति गवई 23 नवंबर को पदमुक्त होंगे। उनके बाद न्यायमूर्ति सूर्यकांत 24 नवंबर को देश के अगले प्रधान न्यायाधीश बनेंगे। गवई भारत के 52वें प्रधान न्यायाधीश रहे और न्यायमूर्ति केजी बालाकृष्णन के बाद दूसरे दलित सीजेआई बने।
अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने कई अहम फैसले सुनाए। वक्फ कानून के प्रमुख प्रावधानों पर रोक, ट्राइब्यूनल सुधार कानून को रद्द करने का फैसला और परियोजनाओं को बाद में पर्यावरण स्वीकृति देने की अनुमति जैसे निर्णय इनमें शामिल हैं। शुक्रवार को उनका अंतिम कार्य दिवस था। अदालत में मिले सम्मान से भावुक गवई ने कहा कि वह 40 वर्षों की यात्रा के बाद संस्थान से संतोष के साथ विदा ले रहे हैं।




















