भारत ने बांग्लादेश के साथ अपनी लंबी और संवेदनशील सीमा की सुरक्षा को और मजबूत करने के लिए बड़ा कदम उठाया है। शुक्रवार को भारत ने तीन नई सैन्य छावनियों का उद्घाटन किया, जो अब पूरी तरह ऑपरेशनल हो चुकी हैं। ये नई छावनियां असम के धुबरी के पास बामुनी, बिहार के किशनगंज और पश्चिम बंगाल के चोपड़ा में बनाई गई हैं।
इन छावनियों को भारतीय सेना और सीमा सुरक्षा बल के लिए शक्ति में वृद्धि यानी फोर्स मल्टीप्लायर के रूप में देखा जा रहा है। इसका मुख्य उद्देश्य भारत-बांग्लादेश सीमा की रणनीतिक कमजोरियों को दूर करना और किसी भी संभावित घुसपैठ या आपात स्थिति में त्वरित कार्रवाई की क्षमता बढ़ाना है।
भारत-बांग्लादेश सीमा करीब 4096 किलोमीटर लंबी है और कई इलाकों में भौगोलिक चुनौतियों से घिरी हुई है। ऐसे में इन नए गढ़ों से न सिर्फ सीमा निगरानी में मजबूती आएगी, बल्कि सीमावर्ती इलाकों में सैन्य प्रतिक्रिया का समय भी घटेगा। सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, ये कदम भारत की सीमा सुरक्षा नीति के लिए निर्णायक साबित हो सकता है।
उत्तर बंगाल में स्थित सिलीगुड़ी कॉरिडोर, जिसे रणनीतिक हलकों में ‘चिकन नेक’ कहा जाता है, भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों को मुख्य भूमि से जोड़ने वाली मात्र 22 किलोमीटर चौड़ी पट्टी है। यह क्षेत्र बेहद संवेदनशील माना जाता है क्योंकि अगर कभी यह कॉरिडोर निशाने पर आया तो भारत के पूरे उत्तर-पूर्वी हिस्से का संपर्क टूट सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि कैमूर से लेकर चोपड़ा तक नए गढ़ों का निर्माण इसी खतरे को कम करने के लिए किया गया है ताकि देश के आर्थिक और सामरिक संपर्क सुरक्षित रहें।
रक्षा सूत्रों ने बताया कि नई छावनियों के साथ-साथ सीमा पर आधुनिक उपकरण, सड़क नेटवर्क और निगरानी प्रणालियों की तैनाती भी बढ़ाई गई है। यह सब भारत की बॉर्डर मॉडर्नाइजेशन ड्राइव के तहत हो रहा है। एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, ये छावनियां न केवल सुरक्षा बलों की उपस्थिति को मजबूत करेंगी बल्कि किसी भी संदिग्ध गतिविधि या घुसपैठ पर तत्काल प्रतिक्रिया देने में मदद करेंगी।
इस कदम का भू-राजनीतिक पहलू भी खासा अहम है। हाल ही में बांग्लादेश के अंतरिम मुख्य सलाहकार प्रोफेसर मोहम्मद यूनुस ने पाकिस्तान के शीर्ष सैन्य अधिकारी जनरल साहिर शामशाद मिर्जा से ढाका में मुलाकात की थी। दोनों के बीच क्षेत्रीय सहयोग और कनेक्टिविटी को लेकर बातचीत हुई थी। भारतीय सुरक्षा हलकों में इस मुलाकात को केवल औपचारिक नहीं, बल्कि क्षेत्रीय समीकरणों में संभावित बदलाव का संकेत माना जा रहा है।
विश्लेषकों का कहना है कि भारत की यह पहल केवल सीमा सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि एक स्पष्ट रणनीतिक संदेश भी देती है कि भारत अपने पूर्वी मोर्चे पर किसी भी अस्थिरता को लेकर सतर्क और तैयार है। यह कदम दर्शाता है कि नई दिल्ली अब सीमाओं की सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता दोनों को लेकर दीर्घकालिक तैयारी में जुट चुकी है।

















